एक-दूसरे को पत्थर मार कर लहूलुहान करने की परम्परा
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| देवीधुरा के खोलीखांड़- दुबाचौड़ मैदान में बग्वाल के लिए एकत्रित होते द्योत। |
उत्तराखंड के देवीधुरा में रक्षाबंधन के मौके पर होता है “पाषाण युद्ध”
जहां एक ओर पूरा देश रक्षाबंधन की तैयारियों में लगा है, वहीं दूसरी ओर अपनी नैसर्गिक सौंदर्य की छटा बिखेरने वाला उत्तराखंड एक बार फिर पाषाण युद्ध (बग्वाल मेला) के लिए तैयार है। आस्था के केंद्र मां बाराही मंदिर देवीधूरा, में होने वाले इस ऐतिहासिक युद्ध के अब कुछ ही दिन शेष हैं। श्रावण मास की पूर्णिमा को होने वाली 'बग्वाल' के लिए रणबांकुरे अपने संबंधियों को आमंत्रण भेजने लगे हैं। ढोल-दमाऊं के ताल कसे जाने के साथ-साथ मशकबीन, रणसिंहाओं की धूल झाड़ी जा रही है और छंतोलों (छत्र, फर) की सजावट का काम जारी है। बाजार सजने शुरू हो गए हैं। बग्वाल मेले को सफल बनाने के लिए जिला प्रशासन ने भी कमर कस ली है। पूरे देवीधुरा कस्बे पर सीसीटीवी कैमरों से लैस कर दिया गया है और चप्पा-चप्पा पुलिस की निगरानी में है। आपसी सद्भाव की इस जीती-जागती मिशाल को देखने विश्वभर से तमाम श्रद्धालु यहां पुहंचने शुरू हो गए हैं। नए नजर इस पाषाण युद्ध के इतिहास पर।
बग्वाल मेला (अषाढ़ी कौतिक)
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| यहां पत्थरों से खेली जाती है “बग्वाल” |
चंपावत जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित देवीधुरा, मां बाराही देवी मंदिर के प्रांगण (खोलीखांड़-दुबाचौड़) में प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा को मेला लगता है, जिसे स्थानीय भाषा में अषाढ़ी कौतिक भी कहते हैं। इसका सर्वाधिक आकर्षण हैः बग्वाल मेला। जिसमें चार खामों (दल) के लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। माना जाता है कि पत्थरों से चोट लगने के बाद बहा खून मां बाराही (पार्वती) को समर्पित हो गया। हालांकि इस मेले की पौराणिकता को लेकर लोगों की राय एक नहीं हैं, फिर भी समझा जाता है कि नरबलि परम्परा का यह अधुनातन रूप है। ऐसी मान्यता है कि पृथ्वी में जब राक्षसों का आंतक बढ़ा तो वह बाराही के विग्रह (मूर्ति) को उठाकर रसातल में ले गए। हाहाकार मचने पर भगवान विष्णु ने बराह अवतार में उस दैत्य का उद्धार किया और मूर्ति भू लोक में ले आए। फिर जिस स्थान पर उसकी स्थापना की गई, वह बाराही सिद्धपीठ के नाम से विख्यात हुआ। मंदिर के महत्वपूर्ण स्थलों में खोलीखांड़-दुबाचौड़, मचवाल, गुफा के भीतर शक्ति पीठ (गबौरी), शंखचक्र घंटाधर गुफा और भीमशिला प्रमुख हैं।
कैसे हुई बग्वाल की शुरुआत
स्थानीय निवासी जगदीश जोशी बताते हैं- ऐसी मान्यताएं हैं कि हजारों वर्षों पहले जब राक्षसों का आतंक बढ़ गया था, तो देवी के गणों ने राक्षसों से मुक्ति के बदले प्रजा से नर बलि की मांग की, जिसके बाद स्थानीय लमगड़िया, चम्याल, गहड़वाल और वाल्किया (खाम) कुलों के लोग क्रमशः अपने लोगों की बलि देते थे। उन्होंने बताया कि एक बार बलि के लिए चम्याल कुल के एक ऐसे परिवार की बारी आई जिसका केवल एक ही पुत्र था। परिवार की मुखिया (एक वृद्धा) ने उसे बचाने के लिए तपस्या शुरू कर दी, जिससे प्रसन्न होकर मां बाराही ने कहा कि यदि चारों कुलों के लोग मंदिर प्रांगण में एकत्र होकर युद्ध कौशल दिखाएं, इस दौरान जब एक युवक के रक्त के बराबर खून बह जाए तो युद्ध बंद कर दिया जाए। इससे गण प्रसन्न हो जाएंगे और नरबलि से छुटकारा मिल जाएगा। उस काल में स्थानीय लोग अश्म युद्ध यानी पत्थर मार कर किए जाने वाले युद्ध में प्रवीण थे। तब से पत्थर मार युद्ध यानी बग्वाल शुरू हुई और खोलीखांड- दूबाचौड़ का मैदान विश्व प्रसिद्ध हो गया। हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा को यहां 'अश्म वृष्टि' होती है।
अश्म था योद्धाओं का हथियार
इतिहास के जानकारों की मानें तो महाभारत काल में पर्वतीय क्षेत्रों में निवास कर रही एक जाति ऐसी थी जो अश्म युद्ध (पत्थर मार युद्ध) में प्रवीण थी और इन योद्धाओं ने पाण्डवों की ओर से महाभारत के युद्ध में भाग लिया था। जो इस बात को पुष्ट करती है कि यह प्रथा पुरातन काल से चली आ रही है।
पुजारी के इशारे पर शुरू होती है “बग्वाल”
युद्ध से पहले चारों खामों के लोग अपनी टोलियों से साथ पूरे मंदिर परिसर की परिक्रमा करते हैं। ढोल-नगाड़ों का नाद, शंख-घंटों की टंकार और मां की जयकार के साथ द्योत उछलते- कूदते पूरे जोशो-खरोश के साथ खोलीखाड़-दुबाचौड़ मैदान में एक-एक कर प्रवेश करते हैं। पीली पगड़ी पहने द्योत (बग्वाल खेलने वाले), हाथों में छंतोले (छत्र) लिए जब प्रांगण में आकर प्रतिद्वंद्वियों की टोह लेना शुरू करते हैं तो ऐसा लगता है कि मानो योद्धाओं की फौज व्यूह रचना कर रही हो। वालिक्या और लगमड़िया खाम पश्चिमी छोर से तो चम्याल और गहड़वाल पूर्वी छोर से रणभूमि में गर्जन करते नजर आते हैं। आसमां जयकारों और रणबांकुरों की ललकार से गुंजायमान हो जाता है। मंदिर के पुजारी से संकेत मिलने के बाद गहड़वाल खाम के द्योत सबसे पहले पत्थर मारते हैं और फिर शुरू हो जाता है द्वंद्व।
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| खोलीखांड़-दुबाचौड़ मैदान में बग्वाल के दौरान छंतोलों के नीचे आकर पत्थरों से बचने का प्रयास करते द्योत। |
कुछ समय के लिए खोलिखाड़-दुबाचौड़ मैदान के ऊपर केवल पत्थरों की आवाजाही दिखती है। सरसराते पत्थर जब द्योतों के ऊपर गिरते हैं तो खून की बहती धार, उनका उत्साह और बढ़ा देती है। लाखों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालु दशर्क दीर्घा से इस “बग्वाल” के गवाह बनते हैं, जो जयकारों से द्योतों का उत्साह बढ़ाते नजर आते हैं।
जब पुजारी को आभास हो जाता है कि एक व्यक्ति के रक्त के बराबर लहू बह चुका है तो वह बिना किसी सुरक्षा कवच के लड़ाई के मैदान में पहुंच, शंख बजाकर युद्ध समाप्ति की घोषणा करते हैं। हालांकि खामों में लोग एक-दूसरे के मित्र या सगे-संबंधी ही होते हैं परंतु रणभूमि में कुछ देर लिए वह सभी नाते-रिश्ते भूल कर परम्परा का निर्वाह करते हैं। कहा जाता है कि 1945 से पहले युद्ध के दौरान पत्थरों से बचने के लिए फरों (छंतोला,छत्र) का प्रयोग नहीं किया जाता था।
जब उठता है सिंहासन डोला
किंवदंतियां हैं कि मां बाराही की प्रतिमा का तेज इतना है कोई भी उन्हें खुली आंखों से देख नहीं आज तक नहीं देख पाया। जो भी ऐसा दुस्साहस करता है, वह अंधा हो जाता है। स्थानीय निवासी घनश्याम शर्मा ने बताया कि श्रावणी पूर्णिमा के दूसरे दिन बक्से में रखे देवी विग्रह (प्रतिमा) को मंदिर के मुख्य पुजारी भी आंखों में पट्टी बांधकर नहलाते हैं और उसके बाद सिंहासन (डोले) पर उन्हें सजाकर शोभा यात्रा निकाली जाती है। जब लोग माता के डोले को कंधों में उठाकर उनके मायके, मचवाल की ओर चलना शुरू करते हैं तो पीछे से श्रृद्धालुओं का कारवां भी साथ चलता है। कहा जाता है कि जब माता का डोला वापस खोलीखांड़-दूबाचौड़ पहुंचता है तो बारिश होती है। मान्यता है कि यह बारिश मायका छोड़ने के दुख में देवी की आंखों से निकले आंसू हैं।
निर्मम जानवरों की बलि
मान्यता है कि देवी को अठ्वार (अष्ठ बलि) देने से वह खुश होती हैं। लोग मन्नत पूरी होने के बाद अठ्वार में सात बकरों और एक भैंसे की बलि देते हैं। बकरों के मांस को तो लोग खा लेते हैं लेकिन भैंसे को यूं ही छोड़ देते हैं। कुछ साल पहले उच्च न्यायालय ने आस्था के नाम पर जानवरों की निर्मम हत्या पर संज्ञान लेते हुए भैंसे की बलि पर रोक लगा दी।
बदलने लगा है बग्वाल का प्रतिरूप
वर्षों से चली रही एक परंपरा (पाषाण युद्ध) के दौरान घायलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रशासन ने युद्ध के तौर-तरीकों में बदलाव कर दिए हैं। बग्वाल मेले के इतिहास में पहली बार साल 2013 में चारों खामों (दल) के रणबांकुरों ने पत्थरों की बजाय फलों (गोल नाशपाती) से बग्वाल खेली। हालांकि कुछ ही देर में द्योतों ने एक–दूसरे पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए थे। आंकड़े बताते हैं कि उस साल प्रशासन की सख्ताई के बावजूद लगभग 80 लोग घायल हुए थे। बीते वर्ष भी पत्थरों की मार से कई लोग घायल हो गए थे। स्थानीय निवासी जगदीश बताते हैं कि बग्वाल खेलने वालों को पिछले तीन दिनों से खुद को पाक रखना पड़ता है। उन्हें सभी तरीके के गरिष्ठ भोजनों को तिलांजलि देनी पड़ती है, जो लोग बिना त्याग किए बग्वाल खेलते हैं अक्सर उन्हें ही गंभीर चोट पहुंचती है।
कैसे पहुंचे “अषाढ़ी कौतिक”
महाभारत काल में पांडवों से जुड़ी अनेक घटना का गवाह, माँ बाराही धाम सुमद्रतल से लगभग 6500 फिट की ऊँचाई पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए काठगोदाम तक ट्रेन या बस के जरिए और उसके बाद 111 किलो मीटर का रास्ता स्थानीय गाड़ियों या टैक्सी/कैब से नापा जा सकता है।
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| खाेलीखांड़ दुबाचौड़ का मैदान। फोटो ः चंद्र शेखर द्विवेदी फसक ः भास्कर शर्मा |



