शरद ऋतु अपने अंतिम पड़ाव पर है, तो जाहिर-सी बात है बागों में क्या, कहीं भी बहार देखने को नहीं मिलेगी। क्योंकि वर्षा काल में जमीन पर कई जीवाणु पनप आते हैं, जिन्हें खत्म करने के लिए सूर्य की किरणें ऊष्म और हवाओं का वेग बढ़ जाता है। बाकी जो बच जाता है धरती में समा जाता है। फिर भी एक जगह है जहां बहार है। वह है ‘कीचड़’। जहां कमल दल खिले हैं और भौंरे गुंजन कर रहे हैं, पर स्वच्छता अभियान के इस दौर में सफाई पंसद लोग खुद को भला क्यों कीचड़ से सना पसंद करेंगे?
पहाड़ों में भी मौसम खुश्क हो चला है। हर्यमान रहने वाले पौड़ सूनसान- विरान से हो गए हैं। बीती दिवाली गांव जाने का मौका मिला। ‘शरद’ का सबसे ज्यादा असर वहां नजर आया। दिनभर का तपा देने वाला घाम और रात में सर्द हवाओं की रजाई के कोनों से आवाजाही, मतलब अगली सुबह ‘नाकबंदी’, जिसे ठीक करने के लिए गर्म पानी और कुछ देर में ‘कडक़ चाय’ की सख्त दरकार। अगर यह व्यवस्थाएं हो जाएं तो ‘सोने में सुहागा’।
इस मर्तबे घर चार माह बाद ही पहुंच गया था, अपने प्रोफेशन में ऐसे मौके कम ही मिलते हैं। पिछली बार गांव वालों से मिल नहीं पाया था। इस बार कसर पूरी की, लेकिन यहां भांग के पौधे ‘शरत’ को लगता है जाने नहीं देंगे। इस दिनों यहां भांग (चरस) के पत्तों की मंड़ाई का काम जोरों पर है। चरस के मायनों में यह बात अच्छी है कि मेरी उम्र के लोग अब गांव में नहीं हैं। अगर होते तो ज्यादातर नशे में चूर ही होते। रोजगार के लिए लोग शहरों में प्रवास कर गए हैं या पलायन कर गए हैं। अब क्या कीजिएगा सरकार छुट्टी पर चल रही है। पता नहीं कब लौटे की। नाकारा-सी हो गई है। अब सवाल उठता है कि क्या हम भी ‘नाकारा’ हो जाएं? यह बात हर किसी के सामने प्रश्न चिह्न है। आखिरकार लोग नशे के खेती क्यों करते हैं, यह जानते हुए यह ‘दम’, दम निकाल देती है। पहाड़ों में चरस को आम भाषा में दम, अत्तर और भोले की बूटी कहते हैं।
पूछने पर एक व्यक्ति ने बताया कि गांव में लोगों के पास रोजगार नहीं है। सरकारी काम बहरहाल बंद हैं। प्रधान कहते हैं कि हमने प्रस्ताव भेजा है, देखो कब तक पास होता है। जो छोटा- मोटा काम आता है, कुछ तो लोग डकार जाते हैं और कुछ की सिद्धि कर दी जाती है। भुला, पहाड़ों में पानी तो ठहरता नहीं, बारिश का भी इन सालों कोई भरोसा नहीं। हुई तो ठीक, ना हुई तो रोटी का संकट। जिनकी आर्थिक स्थिति थोड़ी ठीक- सी है वह बिस्तर समेट कर गांव से निकल गए हैं, जो बचे हैं पेट तो उनका भी है। दो चार पैसे कमाएंगे नहीं तो इस कलयुग में खाएंगे क्या? सच बताऊं तो कुछ न सही, पर भोले की बूटी 100-50 तो दिला ही देती है। सीजनी है, पर कुछ राहत जरूर है, लेकिन बच्चों के नशे की लत पर वो चुप्पी साध लेते हैं। सरकार ने अत्तर के खिलाफ कड़े कानून तो बनाए हैं, पर यहां की स्थिति देखकर असर कुछ नजर नहीं आता।
यह अचरज वाली बात यह है कि मुझे गांव में कोई भी नशे में चूर नहीं आया। मतलब साफ है कि अत्तर गांव से बाहर जाती है। हालांकि वहां पीने वालों का कमी नहीं है। अब सबसे बड़ी बात, इस काम में महिलाओं की सहभागिता भी कम नजर नहीं आती। भांग के पौधों को मांड़ते हुए एक आमा कहती हैं कि हमारे यहां भागं की चटनी का कोई सानी नहीं है। अभी पूस (पौष) लगने वाला है। साग-सब्जियां जब नहीं होती तो मड़ुवे की रोटी के साथ भांग का नमक ही काम आता है और इसके औषधीय गुणों के क्या कहने इसके पत्तों का रस निचोड़ कर घाव में डाल दो तो मजाल है कि भरे ना।
उधर, घाम भी धारों में पहुंच गया था। घर लौटते समय गांव की ही एक काकी ने पूछा ‘म्यर राकेश कै ना दिख्याये काईं’? (क्या तुमने मेरे राकेश को नहीं देखा?) मेरी ना पर उन्होंने कहा ‘खोवी चा रे हुनैल’। (खोवी देख रहा होगा) पहले तो मेरी समझ नहीं आया कि आखिर ‘खोवी’ है क्या? पूछने पर हंसते हुए उन्होंने बताया कि ताश के पत्तों का खेल जहां होता है उसे ‘खोवी’ कहते हैं।
दरअसल, 15 अक्टूबर तक पहाड़ों में सबके खेतों का काम निपट जाता है और अगले 1 माह तक लोग इधर-उधर ‘खोवियों’ में बैठकर या तो टाइम पास करते हैं या पिछले छह माह की कमाई गंवाते हैं। अगले दिन वापसी थी तो गाड़ी में किसी ने बताया कि पाटी के गिरीश ने खोवी में सब कुछ हाने के बाद जिंदगी से भी हार मान ली। जहर पीते हुए उसे एक पल भी नहीं सूझा कि उसके बाद उसकी पत्नी और दो बच्चों के भविष्य का क्या होगा?
इसीलिए बागों में बहार नहीं है और ‘शरद’ खुश्क।
सरकार हृष्ट-पुष्ट है, प्रशासन नाकारा और कामचोर।
नेताओं के मन में है खोट, दिखता उन्हें केवल वोट।
रोजी-रोटी के लिए लगी है लंबी कतार।
यहां भी है नाकाबंदी।
यदि नहीं है आपके पास ‘काले-सफेद’ का तजुर्बा
तो सब बेकार।
है तो बस, 'बागों' में बहार...।
फसक ः भास्कर शर्मा


