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| बांस बस्वाडी |
बड़ी मुद्दत के बाद हमारे गांव बांस बस्वाड़ी में आखिरकार सड़क निर्माण का सही दिशा में होना तय हो गया है और बुलडोजर ने अपना काम भी शुरू कर दिया है। हालांकि यहां सड़क कुछ साल पहले बन चुकी है पर गांव के लोगों की बेरुखी और अनदेखी के चलते रोड की दिशा और दशा दोनों ही खराब है। अब हालिया सर्वे के बाद ग्रामीणों को एक उम्मीद जगी है कि शायद अब गंतव्य तक जाना सहज होगा। हालांकि, अभी इस रोड को मुख्य सड़क से मिलने में काफी वक्त लगेगा क्योंकि निर्माणाधीन रोड और मुख्य सड़क के बीच लगभग दो किलोमीटर चीड़ का जंगल पड़ने के कारण अभी यहां सर्वे नहीं हो पाई है। अधिकारियों ने भरोसा दिलाया है कि जल्द ही इस समस्या का कोई हल निकाल कर, पार पा लिया जाएगा। लेकिन लगता है कि जल्द ही निर्माण कार्य ठप्प हो जाएगा या अधर में लटक जाएगा क्योंकि कुछ लोगों अपनी जमीन जाने से डर रहे हैं।
दरअसल, सर्वे के मुताबिक जिस इलाके से रोड जानी है उसमें लगभग 500 मीटर ऐसा क्षेत्र है जिससे जमीन खिसकने और मकानों के धंसने का खतरा है क्योंकि सर्वे के दौरान स्थानीय लोगों में सहमति नहीं बन पाई और सर्वेकर्ता यह कह कर लौट गए कि आपसी रजामंदी से बात सुलझाई जाए तो सड़क का नक्शा बदला जा सकता है। अन्यथा कोई दूसरा रास्ता निकाला जाएगा। जब काम शुरू हुआ तो लोगों ने इसका हल निकाला कि सड़क को मकान के ऊपर से निकाल जाए, लेकिन इसके लिए गांव के ही एक चाचाजी की जमीन का कुछ हिस्सा कटना पड़ रहा है। यह सुनते ही चाचाजी ने भौंहें सिकोड़ ली और यह कह कर इस बात पर पूर्ण विराम लगा दिया कि हम अपनी जमीन नहीं कटने देंगे, जो करना हो कर लो। कई मिन्नतें कर ली, यहां तक कि जमीन अदला-बदली को भी कहा गया पर, मजाल है कहीं वो टस से मस हो जाएं, उन्हें इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता कि किसी का मकान ढह जाए, उन्हें बस अपने और अपनी जमीन की चिंता है जिसके लिए वह सारा आसमान सिर पर उठा सकते हैं।
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| हिमालय बाग जमनटाक |
धन्य हैं ऐसे लोग जो केवल और केवल अपनी सोचते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि पहली बार ऐसा देखने को मिल रहा है कि इस मामले में बुजुर्ग/प्रबुद्ध जन मौन हैं। सहजता या आराम कौन नहीं चाहता, लेकिन इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि अापकी इस आरामतलबी से किसी को कोई नुकसान तो नहीं हो रहा। बहारहाल, उहापोह की स्थिति बनी हुई है।
मुझे लगता है इस सब का एक कारण ध्रुवीकरण है, जिससे केवल एक वर्ग विशेष को लाभ होता है। लोगों ने एक काकश बना लिया है यदि आप उसके हिस्से हैं तो आपके अहो भाग्य, यदि नहीं तो....उम्मीद है जल्द ही हालात सामान्य होंगे और लोग समेकित विकास की ओर अग्रसर होंगे।
एक दौर था जब लोग गांव की मिसाल देते थे लेकिन आज स्थिति उलट है। लोग एक-दूसरे को शक की निगाहों से देखते हैं, एक-दूसरे को नीचा दिखाने का चलन बढ़ रहा है। एकाकीपन लोगों को पसंद आने लगा है वह उसमें ही खुश नजर आना चाहता है। हालांकि शहरों में अक्सर यह सब आम बात मानी जाती है। परंतु गांवों में ऐसा होना चिंताजनक है क्योंकि आपको अपनी जड़ों के साथ ही रहना है। ना तो सामने वाला कहीं जाने वाला है और ना ही आप, इसीलिए एक-दूसरे का सहारा बन कर रहने में सबकी भलाई है, ना जाने कौन कब कहां और कैसे आपके काम आ जाए।
फसक ः भास्कर शर्मा




