Sunday, 3 July 2022

मेर पहाड़



जब भी मैं बैठता हूं पहाड़ और प्रकृति के नज़दीक
देखता हूं -
क्षितिज से गिरते झरने कल-कल छल-छल
सुनाई देती है हवाओं की सूंसाट
और नदी/गाड़ों की भूंभाट
धारे के पानी की तड़तड़ाट
हरे- भरे पहाड़ों पर डोलते चीड़- देवदार
हुक्का भर चिलम पीते पहाड़।

संकरे रास्तों से जांठी के सहारे चढ़ते बूबू
आमा के सिर डाल्ली में भरा सामान
खेत साते बाज्यू और मेड़ सजती ईजा
दन्यावे पर बैठ मिट्टी में सन चुके बच्चे
ठुल बाज्यू के खेत में लगा हुड़किया बोल
दूसरे छोर पर बीड़ी पीकर‌ सुस्ताते काकज्यू
डांडों पर घास काटती महिलाएं,
उनकी न्यौली पर संगत करते पहाड़।

'खान खा ली'.... धाद लगाती परुवा की ब्योली
हो.. होई कह प्रत्युत्तर देता प्रकाश
आंगन में फुदकती 'ग्यांव' और घात लगाकर बैठी 'शिरू'
नारिंग के पेड़ों पर चहचहाते 'सिटौल'
और अनंत में रेस लगाते 'शूवे'
चीड़ के पेड़ों पर बैठ एक- दूसरे को खुजाते 'गूनी'
नीचे उतरने का इंतज़ार करती 'सिल्की'
पार वाली धार से नीचे 'काकड़' को पछेटता 'शेरू'
उज्याड़ खाती गाय, ओवान करती काखी
और उसे लेने दौड़ता केदार
ऐसा सतरंगी है मेर पहाड़।



Friday, 21 January 2022

राजुला के नाम... ✍

कुछ वर्ष पूर्व लिखी गई यह रचना आज किताबों को खंगाते हाथ लगी। क्या दिन थे...! उन दिनों लिखने की चाह ऐसी थी कि कुछ ही समय में कई पन्ने रंग जाते थे। कुछ जबरन लिखवाए जाते तो कुछ ऑन डिमांड तैयार किए जाते थे। दरअसल, यह रचना एक अनाम उपन्यास का हिस्सा है, लेकिन किन्हीं कारणों से वह उपन्यास अधूरा रह गया। सोचता हूं अब इस प्लेटफॉर्म के जरिए उसके अंश आप तक पहुंचाता चलूं। यह रचना उपन्यास का उत्तरार्ध है, जिसे शुरुआत में लेखन के प्रवाह को बनाए रखने के लिए उत्तम पुरुष में लिखा गया था। अब इसे ठीक वैसे ही पेश कर रहा हूं।

नायक- नायिका अलग- अलग राह पकड़ चुके हैं। हालांकि सुना तो ऐसा भी गया कि सहमति से दोनों ने यह रास्ता चुना... लेकिन किसी भी एंगल से लगता नहीं था कि यह विच्छेद म्यूचुअल‌ डिसीजन था, जिसकी खास तौर पर नायक चर्चा कर साथियों के बीच खुद को सामान्य दिखाने की असफल कोशिश करता था। 

इधर, दिन बीते... फिर हफ्ते और हर ढलते‌ दिन के साथ नायिका के वियोग में नायक बचैन हो जाता है। हर समय वह नायिका के साथ बिताए पलों को याद कर मन ही मन सही-गलत की पहेली में उलझा रहता। मन में चल रही ऊहापोह को "नायिका के नाम ख़त" लिख कर शांत करने का प्रयत्न करता। हालांकि वह जानता है कि दूरियां अब इतनी हैं कि ख़त लिखने का कोई औचित्य ही नहीं है, लेकिन यह दौर उसके 'देवानंदपन' का है। इसलिए मन को कैसे भी कर के समझाने का यत्न करता है। उम्मीद है इस सफ़र में आप भी नायक के‌ हम‌सफ़र बनेंगे और अन्त‌‌ में यथार्थ से रू-ब-रू होंगे ।



प्रिय
      राजुला

      मुझे ठीक से तो याद नहीं... लेकिन शायद 2013 के नवंबर या दिसंबर का वक़्त रहा होगा जब फेसबुक के ज़रिए हमारी बातों का सिलसिला शुरू हुआ था और पिछले दिनों ही आपका 'आखिरी ख़त' भी मिला। अच्छा लगा एक बार फिर फ्लैश बैक में जाने से पुरानी यादें ताजा हो गईं। एक बात तो है... अब आप और अच्छा लिखने लगी हैं। एक समय वह भी था जब आप मुझसे हिंदी पढ़ने की बात किया करते थे, जिसे मैं तो पढ़ा नहीं पाया... पर आप मुझे ज़िन्दगी जीने का सलीका सिखा गईं। आपने बताया कि कैसे छोटी- छोटी बातों से दूसरों को खुशियाँ दी जा सकती हैं। 

पता है... आपका चेहरा‌‌ ना... सबसे जुदा है... जो देखे देखता रह जाए... बड़ी- बड़ी आंखें, दमकता ललाट, हमेशा गुलाबी रहने वाले होंठ और थोड़ी चपटी नाक.... जो आपको पहाड़ी टच देती है। सुनो तो... गौर से देखने पर लगता है अब वह थोड़ी- सी टेढ़ी भी हो चली है। खैर... जो भी हो मुझे बहुत पसंद है। इन बीते सालों में एक दौर ऐसा भी आया कि आप मेरी सुबह- शाम बन गए थे। आपको तो पता ही है, दिन की शुरुआत से रात के आख़िरी प्रहर तक शायद ही ऐसा कोई पल रहा हो जब हम एक- दूसरे से दूर रहे हों। 

आप में कुछ तो ऐसा था जो सब में नहीं होता, तभी तो जब कहने को कुछ भी नहीं होता था उसके बावजूद भी 'हम्म.... हां...', 'और बताओ' में हमारे कई घंटे निकल जाते और पता भी नहीं चलता था। आधी रात से सुबह तक की चैटिंग नोकिया 1600 की मैमोरी दो-चार बार फुल करने के लिए काफी थी। और हां... भौतिक रूप से मिलने का एक मात्र संस्थान- होटल सर्वणा को कैसे भूल सकते हैं, जिसके वेटर हमारी पसंद का भोजन खुद ही ले आते थे। यह एक ऐसी जगह थी जहां आप खाना खाने की बजाय मुझे एक टक देेखते रहते... मैं कहता- राजुुुला‌ बस भी करो सब यहीं देख रहे हैं।

याद है...! जब मैं शहर के पल्ले वाले मोड़ तक आपको छोड़ने आया था। हां... उसी दिन जब सांझ हो आई थी। बस‌ से उतरने के बाद हम कुछ दूर तक‌ साथ चले और अंधेरा छाने लगा था। स्ट्रीट लाइट के उजाले‌ में आपका चेहरा दमक रहा था। साथ होने की ख़ुशी उसमें साफ झलक रही थी। घर पास आने पर आप कहते‌ - अब लौट जाओ मैं चली जाऊंगी, बस चार कदम और चलना है... लेकिन ज़िद थी घर तक छोड़कर आना है। अंत में जब आपको छोड़ने की बारी आती थी तो चेहरा सारा सच बयां कर देता था। मन कहता - काश ये शाम कुछ देर ठहर जाए... मैं थोड़ा और वक़्त अपनी राजुला के साथ बिता सकूं। लेकिन कई मामलों में शाम भी निष्ठुर हो जाती है। वह मेरी क्या, किसी की भी नहीं सुनती। ऐसे मेें थोड़ी-सी ज़िद बहुत काम आती थी और अंत में बिछुड़न...

सच‌ कहूं तो तब से लेकर आज तक मैं किसी से कभी कोई ज़िद नहीं कर पाया, क्योंकि ये आप थे जो कहने से पहले मेरी हर बात समझ जाते। मेरे लिए आप एक‌ इंसान थे- 

जो हर संभव मेरे साथ रहता है
मेरी हर नादान चाह पूरी करता है
जो मुझमें ही रहता, मेरा ही गीत गाता है
मेरी वेदनाओं की संवेदना, मेरे रूह का आफ़ताब... 
मन करता है घंटों सामने बैठा रहूं और आपको सुनता रहूं। 

याद है... एक बार जब हम बस से सफ़र कर रहे थे तो मेरे शहर छोड़ने की बात‌‌ सुनकर आपकी आंखें‌ डबडबा गई थीं और गला रुध गया था।‌ कुछ कहना चाहते थे आप, पर केवल मेरा नाम ही ले पाए। लंबी सांस लेकर आपने ख़ुद को सामान्य दिखाने की कोशिश की। मैं आपके मन में चल रही ऊहापोह को‌ समझ तो गया था पर अफसोस...! उसे जाहिर नहीं कर पाया। 

मुझे ना आपका लड़ना-झगड़ना यहां तक कि कई बातों को लेकर ताना देना भी पसंद है। ऐसी कोई बात नहीं जो इस चाह को ज़रा-सा भी कम कर दे। हालांकि अब आप साथ नहीं हो.. लेकिन लगता है दूर रहकर भी पास हो।
एक बात तो तय है आपके दूर हो जाने के बाद अब मेरे ख़्वाब... ख़्वाब ही रहेंगे। सुबह से लेकर शाम तक और शाम से लेकर सुबह तक आपसे बातें करने का ख़्वाब ।
जीभर के देखने, तुम्हारे बालों से खेलने का ख़्वाब ।
हाथों में हाथ लेकर उस‌ पल्ले वाले छोर तक जाने का ख़्वाब। शायद यही हमारा प्रारब्ध था।

इस सब के बावजूद आज भी मेरे लिए आप वही हो-

जो मुझे मुझसे भी ज्यादा जानता है।
मेरे हर सवाल का जवाब, मेरे पार्थिव का प्राण
तुम बिन मैं कुछ भी नहीं केवल खूंट-ठूंठ के। 

आप थे तो बागों में बहार थी, सावन की महकार के साथ बसंत की फुहार भी... पर अब ये दौर पतझड़ का है और यह जीवन का एक अर्ध सत्य...। 

सदा तुम्हारा




                      ©Bhaskar Sharma 

                                 ©म्यार फस्क