जब भी मैं बैठता हूं पहाड़ और प्रकृति के नज़दीक
देखता हूं -
क्षितिज से गिरते झरने कल-कल छल-छल
सुनाई देती है हवाओं की सूंसाट
और नदी/गाड़ों की भूंभाट
धारे के पानी की तड़तड़ाट
हरे- भरे पहाड़ों पर डोलते चीड़- देवदार
हुक्का भर चिलम पीते पहाड़।
संकरे रास्तों से जांठी के सहारे चढ़ते बूबू
आमा के सिर डाल्ली में भरा सामान
खेत साते बाज्यू और मेड़ सजती ईजा
दन्यावे पर बैठ मिट्टी में सन चुके बच्चे
ठुल बाज्यू के खेत में लगा हुड़किया बोल
दूसरे छोर पर बीड़ी पीकर सुस्ताते काकज्यू
डांडों पर घास काटती महिलाएं,
उनकी न्यौली पर संगत करते पहाड़।
'खान खा ली'.... धाद लगाती परुवा की ब्योली
हो.. होई कह प्रत्युत्तर देता प्रकाश
आंगन में फुदकती 'ग्यांव' और घात लगाकर बैठी 'शिरू'
नारिंग के पेड़ों पर चहचहाते 'सिटौल'
और अनंत में रेस लगाते 'शूवे'
चीड़ के पेड़ों पर बैठ एक- दूसरे को खुजाते 'गूनी'
नीचे उतरने का इंतज़ार करती 'सिल्की'
पार वाली धार से नीचे 'काकड़' को पछेटता 'शेरू'
उज्याड़ खाती गाय, ओवान करती काखी
और उसे लेने दौड़ता केदार
ऐसा सतरंगी है मेर पहाड़।
म्यार और फस्क कुमाऊंनी भाषा के शब्द हैं। म्यार माने मेरे, फस्क माने गप, गपशप। यहां आप कविताएं, संस्मरण और लप्रेक पढ़ सकते हैं।
Sunday, 3 July 2022
मेर पहाड़
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Aap ne drash avlokan accha kiya he, per ye sub sanskriti ab khatm hone ki oor h. Pahadi me. Aap ne bhasha me gajb ki pakd banai he. Aap chahen to acchi kahaniyaan likh sakte he. Aap me pratibha he.
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया
Deleteइसी पहाड़ीपन को बनाए रखना है। लगे रहो, बहुत बढ़िया। 🙏
ReplyDeleteधन्यवाद सर जी
Deleteशब्दों की इतनी सुंदर कारीगरी और कुमाउनी भाषा के शब्दों से पिरोया से दृष्टांत बहुत ही सजीव है। आप इसी में भविष्य को सांवरे मातृ भूमि की सेवा के साथ साथ ये कला भी निखरेगी। अनंत शुभकामनाओं के साथ प्यार।
ReplyDeleteआपकी टिप्पणियां भी इसे निखारने में मददगार सिद्ध होंगी। बहुत धन्यवाद दाज्यू ।
Deleteअत्यंत ही सुंदर सजीव चित्रण किया है नेत्रों के आगे पूरा परिदृश्य चित्रित हो गया सजीव हो गया। बहुत अच्छा लगता है जब आप जैसे युवा अपनी भाषा व संस्कृति को आगे बढ़ाने का कार्य अपनी लेखनी द्वारा करते है, ऐसे ही अपनी लेखनी की धार को तेज बनाये रखना।
ReplyDeleteजी ज़रूर, बहुत बहुत धन्यवाद।
ReplyDeleteBahut hi shandar post 👍🏼👍🏼👌👌
ReplyDeleteबहुत- बहुत धन्यवाद अदिति🙏
DeleteWah bahut khoob
ReplyDeleteशुक्रिया शुक्ला जी
Deleteशानदार, सुंदर , मज़ा आ गया पढ़कर, बार बार पढ़ने का मन करे, ऐसा लिख दिया है, कमाल कर दिया है❤️
ReplyDeleteधन्यवाद दाज्यू🙏
Deleteऐसे शब्दों की जादूगरी को बनाए रखना बहुत बढ़िया।
ReplyDeleteजी भाई जी ज़रूर.., शुक्रिया।
DeleteVery well written!
ReplyDeleteThanks Bhai
Deleteबहुत ही शानदार रचना| ऐसे ही अपने मन के विचारों को साझा करते रहो|
ReplyDeleteजी ज़रूर, धन्यवाद
Deleteपहाड़ों की रोजमर्रा की जिंदगी को बड़े ही खूबसूरत अंदाज में बयान दिया भाई। मन कर रहा कि बस जाकर वहीं बस जाऊं
ReplyDeleteधन्यवाद सर जी
DeleteBoht khubsurat vivran. Aap ek umda lekhak hai. Aapke agle lekh ka intzar rahega.
ReplyDeleteधन्यवाद निखिल जी🙏
Deleteभौते जीवंत चित्रण छ दा,आब त रोप लगून मौसम ले आगो। भौत बढ़िया 🌺👌
ReplyDeleteधन्यवाद भुला। 😊
DeleteHeart touching ❤👌
ReplyDeleteशुक्रिया योगेश जी
DeleteBahut badhiya, Shandaar.
ReplyDeleteThank you Sir
Deleteप्रिय भाष्कर ! देव भूमि उत्तराखण्ड के प्राकृतिक सोंन्दर्य का इतना सुन्दर व हूबहू चित्रण करके तुमने न केवल देव भूमि वासियों की ही अपितु देश विदेश में रह रहे परिवारों की भी आँखें खोलने का काम किया है। मेरे विचार से यह फस्क से ज्यादा देव भूमि के कवि द्वारा प्राकृतिक छटा का सटीक चित्रण कहीं अधिक है। ईश्वर तुम्हारे कवि हृदय को और अधिक ऊर्जा प्रदान करें, यही प्रार्थना है।
ReplyDeleteआदरणीय भुवन जी को मेरा प्यार भरा नमस्कार। आपकी टिप्पणियाँ ही मेरे लिए आशीर्वाद सदृश हैं। नि:संदेह यह देव भूमि के सौंदर्य का चित्रण है। रही 'फस्क' की बात तो यह ब्लॉग का नाम भर है। इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि इसमें 'फस्क-फराव' ही पढ़ने को मिलेंगे। एक बार फिर से हार्दिक आभार🙏
ReplyDeleteGreat
ReplyDeleteधन्यवाद भाई जी
Deleteदिल खुश हो गया 👌👍
ReplyDeleteधन्यवाद
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