Sunday, 3 July 2022

मेर पहाड़



जब भी मैं बैठता हूं पहाड़ और प्रकृति के नज़दीक
देखता हूं -
क्षितिज से गिरते झरने कल-कल छल-छल
सुनाई देती है हवाओं की सूंसाट
और नदी/गाड़ों की भूंभाट
धारे के पानी की तड़तड़ाट
हरे- भरे पहाड़ों पर डोलते चीड़- देवदार
हुक्का भर चिलम पीते पहाड़।

संकरे रास्तों से जांठी के सहारे चढ़ते बूबू
आमा के सिर डाल्ली में भरा सामान
खेत साते बाज्यू और मेड़ सजती ईजा
दन्यावे पर बैठ मिट्टी में सन चुके बच्चे
ठुल बाज्यू के खेत में लगा हुड़किया बोल
दूसरे छोर पर बीड़ी पीकर‌ सुस्ताते काकज्यू
डांडों पर घास काटती महिलाएं,
उनकी न्यौली पर संगत करते पहाड़।

'खान खा ली'.... धाद लगाती परुवा की ब्योली
हो.. होई कह प्रत्युत्तर देता प्रकाश
आंगन में फुदकती 'ग्यांव' और घात लगाकर बैठी 'शिरू'
नारिंग के पेड़ों पर चहचहाते 'सिटौल'
और अनंत में रेस लगाते 'शूवे'
चीड़ के पेड़ों पर बैठ एक- दूसरे को खुजाते 'गूनी'
नीचे उतरने का इंतज़ार करती 'सिल्की'
पार वाली धार से नीचे 'काकड़' को पछेटता 'शेरू'
उज्याड़ खाती गाय, ओवान करती काखी
और उसे लेने दौड़ता केदार
ऐसा सतरंगी है मेर पहाड़।



36 comments:

  1. Aap ne drash avlokan accha kiya he, per ye sub sanskriti ab khatm hone ki oor h. Pahadi me. Aap ne bhasha me gajb ki pakd banai he. Aap chahen to acchi kahaniyaan likh sakte he. Aap me pratibha he.

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  2. इसी पहाड़ीपन को बनाए रखना है। लगे रहो, बहुत बढ़िया। 🙏

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  3. शब्दों की इतनी सुंदर कारीगरी और कुमाउनी भाषा के शब्दों से पिरोया से दृष्टांत बहुत ही सजीव है। आप इसी में भविष्य को सांवरे मातृ भूमि की सेवा के साथ साथ ये कला भी निखरेगी। अनंत शुभकामनाओं के साथ प्यार।

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    1. आपकी टिप्पणियां भी इसे निखारने में मददगार सिद्ध होंगी। बहुत धन्यवाद दाज्यू ।

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  4. अत्यंत ही सुंदर सजीव चित्रण किया है नेत्रों के आगे पूरा परिदृश्य चित्रित हो गया सजीव हो गया। बहुत अच्छा लगता है जब आप जैसे युवा अपनी भाषा व संस्कृति को आगे बढ़ाने का कार्य अपनी लेखनी द्वारा करते है, ऐसे ही अपनी लेखनी की धार को तेज बनाये रखना।

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  5. जी ज़रूर, बहुत बहुत धन्यवाद।

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  6. Bahut hi shandar post 👍🏼👍🏼👌👌

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    1. बहुत- बहुत धन्यवाद अदिति🙏

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  7. शानदार, सुंदर , मज़ा आ गया पढ़कर, बार बार पढ़ने का मन करे, ऐसा लिख दिया है, कमाल कर दिया है❤️

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  8. ऐसे शब्दों की जादूगरी को बनाए रखना बहुत बढ़िया।

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    1. जी भाई जी ज़रूर.., शुक्रिया।

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  9. बहुत ही शानदार रचना| ऐसे ही अपने मन के विचारों को साझा करते रहो|

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  10. पहाड़ों की रोजमर्रा की जिंदगी को बड़े ही खूबसूरत अंदाज में बयान दिया भाई। मन कर रहा कि बस जाकर वहीं बस जाऊं

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  11. Boht khubsurat vivran. Aap ek umda lekhak hai. Aapke agle lekh ka intzar rahega.

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  12. भौते जीवंत चित्रण छ दा,आब त रोप लगून मौसम ले आगो। भौत बढ़िया 🌺👌

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  13. प्रिय भाष्कर ! देव भूमि उत्तराखण्ड के प्राकृतिक सोंन्दर्य का इतना सुन्दर व हूबहू चित्रण करके तुमने न केवल देव भूमि वासियों की ही अपितु देश विदेश में रह रहे परिवारों की भी आँखें खोलने का काम किया है। मेरे विचार से यह फस्क से ज्यादा देव भूमि के कवि द्वारा प्राकृतिक छटा का सटीक चित्रण कहीं अधिक है। ईश्वर तुम्हारे कवि हृदय को और अधिक ऊर्जा प्रदान करें, यही प्रार्थना है।


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  14. आदरणीय भुवन जी को मेरा प्यार भरा नमस्कार। आपकी टिप्पणियाँ ही मेरे लिए आशीर्वाद सदृश हैं। नि:संदेह यह देव भूमि के सौंदर्य का चित्रण है। रही 'फस्क' की बात तो यह ब्लॉग का नाम भर है। इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि इसमें 'फस्क-फराव' ही पढ़ने को मिलेंगे। एक बार फिर से हार्दिक आभार🙏

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  15. दिल खुश हो गया 👌👍

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