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Wednesday, 5 July 2017

पहली किश्त, बचपन की

पूष की एक शाम घाटी में एक छोटे-से टीले पर बैठे-बैठे मैं क्षितिज की ओर टकटकी लगाए देख रहा था। दूर पहाड़ पर चीड़ के पेड़ निःशब्द खड़े थे, सूर्य भी अपनी किरणें समेटने को था। तभी चिड़ियों का झुंड़ उड़ता हुआ आया और मेरी आंखों के सामने से ओझल हो गया। हवा की शीतलता गहराने लगी थी। हालांकि मैं दो-तीन ऊनी कपड़े पहने था फिर भी हवा उन्हें बेधकर बदन को ठिठुरा रही थी। गधेरे के पानी को ढलते सूरज की किरणें चमका रही थी, लग रहा था मानो किसी ने मुंह पर दर्पण लगा दिया हो। हवा तेज हो चली थी। गधेर के पास खड़े उतीश और मेव के पेड़ों की डालियां हिलने से बहता पानी भी झिलमिला-सा रहा था, एकाएक चमकता और ढक जाता। पीठ पीछे चीड़ के पेड़ों की पत्तियों पर हवा की सरसराहट और तेज हो गई। नीचे आम के पेड़ों के झुरमटों के बीच पक्षियों की चहचहाहट बता रही थी कि अब घर लौट चलो शाम अपने अंतिम पड़ाव पर है। बांयी ओर की धार में अचानक धूल का बवंडर आसमान की ओर उड़ता दिखाई दिया। धूल कुछ छटीं तो देखा गायों का झुंड़ दौड़ता हुआ नीचे की ओर आ रहा है, जो कुछ ही पलों में काफल के पेड़ों की ओट में गुम-सा हो गया। घाम अब चढ़ाई चढ़ते हुए दूर पहुंच चुका था। इतनी देर में आंखों के सामने से कुन्स्यावों का जोड़ा सरपट पास के झूड़ों में ओझल हो गया।उधर, पल्ले छोर पर पहाड़ों के ऊपर घने बादल अपना डेरा जमाए थे। तभी तेज हवा का झौंका सामने वाले पहाड़ से जा टकराया और इसी के साथ सूरज भी अस्त हो गया।

ज्यों ही सूर्य की किरणें शुभरात्रि कह गईं ठंड का अहसास और बढ़ा गईं। कुछ देर बाद नाक से पानी भी आने लगा। पोछने को हाथ बढ़ाया तो मालूम पड़ा कि नाक की डंठल भी सुन्न-सी हो गई है। सुना है कल रात नैनीताल की ओर बर्फ पड़ी थी। दो-चार दिनों में यहां भी पड़ने की उम्मीद है। अगास की ओर देखा तो चंद्रमा भी अपने साथ घेर लिए हुए आगे बढ़ रहा था। उधर बादल अपनी चकाचौंध दिखाते हुए अग्रसर हो रहे थे। ठीक ही किया जो बीती शाम लकड़ियां बंटोर ली, नहीं तो खाने पकाने के लिए मशक्कत करनी पड़ती। भीगी लकड़ियों से खाना बनाते ईजा की आंखें धुएं से नम हो जाती ना। खैर, अब अलाव धुंआ नहीं करेंगे।

अंधकार अपनी बिसात बिछा रहा था। मैं भी घर की ओर चल दिया। रूंड़ में आग जलाकर रात के भोजन की तैयारी करने लगा। इस बीच कमरा भी अच्छी तरह गर्म हो गया था।आसमानी बिजली आंगन के पाथरों पर पड़े पाले को चमका रही थी। सामने के जंगल में एक मैना बहुत देर से क्रंदन कर रही थी। लगता है उसका घरौंदा किसी बानर ने नष्ट कर दिया है। हवा थमने का नाम नहीं ले रही थी, जिसके कारण संतरे के पेड़ों पर बैठे पंछी लगातार चहचहा रहे थे। रात का पहला प्रहर बीतने को था। अभी तक ईजा और बाज्यू काम से नहीं लौटे थे। द्वार उघाड़कर देखा तो बाहर घुप्प अंधेरा था। टॉर्च लेकर उन्हें खोजने निकला तो सर्द हवाओं ने फिर पूरा बदन कंपा दिया। सारी गर्माहट छू हो गई। अभी सौ एक मीटर ही चला था, देखा सामने से कोई खतरनाक जीव मेरी ओर बढ़े चले आ रहा है। मैं थोड़ा सहम गया। कमबख्त टॉर्च की रोशनी भी वहां तक नहीं पहुंच रही थी। अचानक शेरू पूंछ हिलाते हुए सामने आ गया और उछल कूद शुरू कर दी। पुचकारने पर शांत हो गया। ईजा और बाज्यू भी अब पास ही पहुंच गए थे। ईजा के सिर पर रखा घास का गठ्ठर स्याह रात में किसी जंगली जानवर से कम नहीं लग रहा था। पिछले ही महीने तो बाग और शेरू की भिड़त हुई थी उस पल्ले वाले धार के खेत में, भाग अच्छे थे बच गया। खैर, अब जान पर जान आ गई थी। बाज्यू साथ हैं तो डरने की क्या बात है। फिर सब साथ हो लिए और जानवरों को चारा देन के बाद हम घर आ गए और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। ईजा ने पिनालू की सब्जी और मडुवे की रोटी पात दी साथ में दही का छसिया, वाह क्या लज़ीज खाना। ईजा के हाथों बना....

अब, वह सब बहुत याद आता है। मैं आज वहां नहीं हूं पर मन हर रोज उन पहाड़ों की सैर जरूर करता है। इस शहर में आए दस साल होने को हैं। यहां न दिन निकले का पता पड़ता है, न ही शाम ढलने का। दिनभर सड़कों पर गाड़ियों की भूंभाट और कान फोड़ू शोर-शराबा। जुलाई शुरू हो गया है। उमस भरी इन गर्मी के दिनों को काटना मेरे लिए अब भी बहुत दुष्कर है। चाहे घर के भीतर रहो या बाहर पसीने से लथपथ ही रहोगे। लेकिन अब कुछ आदत हो गई है यूं ही रहने की। कुछ परेशान भी होता हूं, पर मेरे पास अभी कोई दूसरा विकल्प नहीं है। तलाश जारी है... और इस उधेड़बुन में जब भी अकेला होता हूं तो बचपन आंखों में तैरने लगता है। जिसकी यह पहली किश्त थी और आज सार्वजनिक हो गई...।
   



फसकः भास्कर शर्मा