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Sunday, 3 July 2022

मेर पहाड़



जब भी मैं बैठता हूं पहाड़ और प्रकृति के नज़दीक
देखता हूं -
क्षितिज से गिरते झरने कल-कल छल-छल
सुनाई देती है हवाओं की सूंसाट
और नदी/गाड़ों की भूंभाट
धारे के पानी की तड़तड़ाट
हरे- भरे पहाड़ों पर डोलते चीड़- देवदार
हुक्का भर चिलम पीते पहाड़।

संकरे रास्तों से जांठी के सहारे चढ़ते बूबू
आमा के सिर डाल्ली में भरा सामान
खेत साते बाज्यू और मेड़ सजती ईजा
दन्यावे पर बैठ मिट्टी में सन चुके बच्चे
ठुल बाज्यू के खेत में लगा हुड़किया बोल
दूसरे छोर पर बीड़ी पीकर‌ सुस्ताते काकज्यू
डांडों पर घास काटती महिलाएं,
उनकी न्यौली पर संगत करते पहाड़।

'खान खा ली'.... धाद लगाती परुवा की ब्योली
हो.. होई कह प्रत्युत्तर देता प्रकाश
आंगन में फुदकती 'ग्यांव' और घात लगाकर बैठी 'शिरू'
नारिंग के पेड़ों पर चहचहाते 'सिटौल'
और अनंत में रेस लगाते 'शूवे'
चीड़ के पेड़ों पर बैठ एक- दूसरे को खुजाते 'गूनी'
नीचे उतरने का इंतज़ार करती 'सिल्की'
पार वाली धार से नीचे 'काकड़' को पछेटता 'शेरू'
उज्याड़ खाती गाय, ओवान करती काखी
और उसे लेने दौड़ता केदार
ऐसा सतरंगी है मेर पहाड़।