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Monday, 12 June 2023

सीपी सर्कल की किस्सागोई

राजुला के नाम भाग -2

शुक्रवार का दिन था। सुबह लगभग 10 बजे नींद खुली.. लेकिन अलसाहट अब भी बाकी थी। किस्मत भली थी आज वीक ऑफ था। कुछ देर और सोने के बाद लगा अब नींद पूरी हो चुकी है... उठ जाना चाहिए। लेटे हुए ही मोबाइल फोन खोजने के लिए हाथों से बिस्तर टटोला... तो पाया वह सिरहाने के एक कोने पर पड़ा है। ऑन किया... तो देखता हूं... आपकी छह मिस्डकॉल... और तीन मैसेज, सुबह पांच बजे‌ के आए हुए हैं। उससे ठीक एक घंटा पहले ही तो मैं फोन साइलेंट कर सोया था। रिप्लाई करने के बाद पता नहीं क्यों... अंगुलियां फोन की गैलरी की ओर बढ़ गईं। तभी नज़र एक फोटो पर आकर टिक गई। ठीक-ठीक तो याद नहीं पर शायद 2015 की बात रही होगी। मार्च खत्म होने को था और गर्मियां उरूज पर जाने को बेताब.... इत्फ़ाकन उस दिन भी ऑफिस की छुट्टी थी। फोन पर आपसे बात‌ हुई... तो सीपी में डिनर को प्रोग्राम तय हो गया।
हर बार की तरह मैं फिर से लेट था। इस बार भी पूरी भूमिका बनाकर तयशुदा जगह (राजीव चौक मेट्रो स्टेशन) पहुंचा था कि मामला संभालना कैसे है, लेकिन उसका बहुत ज्यादा फ़ायदा होता नहीं था। आपको जो कहना-सुनाना होता, आप एक ही सांस में कह डालते थे। मुझे तल्ख लहज़े वाले आपके चेहरे के भाव अब भी ठीक से याद हैं। आप कहते  - "हमेशा लेट...! कभी टाइम पर तो आना ही नहीं है। आधे- आधे घंटे वेट करवाते हो.. अगली बार अब मिलने के लिए बोलना मत...। " और ना जाने क्या-क्या... उसके बाद भी जो कुछ छूट जाता...उसकी कसर आंखें पूरी कर देती थी। मैं हमेशा की तरह कहता- "यार अगली बार पक्का टाइम पर आऊंगा"... आप डपट कर कहते-" रहने दो... कभी नहीं सुधरोगे आप... अब चलो।" दो चार कदम चलने के बाद आप कुछ ऐसे पेश आते जैसे कुछ हुआ ही न हो.. " अच्छा सुनो ना.. यार जब मैं आ रही थी ना.. पता है क्या हुआ.. और फिर कभी खत्म न होने वाली बातें.. मैं अच्छा.. सच्ची.. फिर क्या हुआ.. से आगे कभी नहीं गया। हालांकि, कुछ और कहने का मौका मिलता भी नहीं था और सच पूछो तो इसकी जरूरत भी नहीं थी। जब सामने से कोई कुछ कह रहा हो.. तो आदर्श स्थिति तो यही कहती है कि आप उसे सुनते रहें।

साल की वह दूसरी या तीसरी मुलाकात रहेगी होगी, जब मुझे देरी के लिए आपसे सुनना पड़ता था। माथे का बल और उभरी भौंह यह बताने के लिए काफी थी कि आज कुछ तगड़ा टॉनिक मिलने वाला है। भले ही मैं आने में अक्सर देरी कर देता था, लेकिन मैंने जानबूझकर ऐसा कभी नहीं किया। दरअसल क्या है ना.. पहले ये दिल्ली के ऑटो और जाम परेशान करते हैं, फिर रही सही कसर मेट्रो के 20 मिनट पूरी कर देते हैं। जब देरी का एहसास होता है तो लगता है समय बहुत‌ तेजी से भाग रहा है और स्टेशन है कि आने का नाम नहीं ले रहा है। कभी-कभी यलो लाइन में कोई तकनीकी दिक्कत आ जाए तो...घोर विपदा!

सुनो, वो वाला किस्सा याद है.. जिस दिन हम एनएसडी गए थे। उस दिन भी इंतजार किया था किसी ने.. बस किरदार बदल गया था। आपने पूरे 35 मिनट वेट करवाया और जब हम मिले तो आपने ताना देते हुए कहा- "पता चला..कैसा लगता है इंतज़ार कराना?"
यार एक तो लेट आ रही हो.. मैं कुछ और कहता इससे पहले आप बोल पड़ी ~ मुझे ऐसा क्यों लग रहा है आप बस अभी-अभी पहुंचे हो..?
नहीं, आधे घंटे से ज्यादा हो गया।
ये हो ही नहीं सकता.. अगर आप आए होते.. तो अब तक तो 50 कॉल कर दिए होते।
मुझे एक मौका मिला था.. कुछ सुनाने का... वो भी जाता रह गया।

खैर, मेट्रो के गेट नम्बर-6 से बाहर निकलने के बाद हम जनपथ लेन की और बढ़ रहे थे। उस दिन गहरे नीले रंग के प्रिंटेड सूट में थे आप। सिर के बाल बंधे थे। लंबे इतने कि खोल दो तो करधनी को छू लें। कुंडलों ने कानों पर अनावश्यक भार दे रखा था। कितनी बार कहा है... क्या ज़रूरत है इतने भारी इयररिंग्स पहनने की? लेकिन आप किसी की सुनते कहां हो?

लगभग 10 मिनट बाद हम रेस्तरां के सामने थे। साढ़े आठ बजने को होंगे, लेकिन तपिश कम होने का नाम नहीं ले रही थी। ऊपर से अंदर जाने के लिए 20 मिनट का इंतजार... और बड़ी आफ़त..। इससे बचने के लिए हम जनपथ लेन के दो-तीन चक्कर मार लेते थे। अंत‌ में भीड़ को चीर कर आप गार्ड के पास‌ जाकर पता करते ' भइया नम्बर कब आएगा?' मैं पास ही खड़ा इंतजार कर ही रहा था कि गार्ड ने आपका नाम लिया। इतने में आप पास आईं और हाथ पकड़ कर बोलीं- चलो नम्बर आ गया। गर्मी के मौसम में एसी की हवा और आपका साथ हो तो कहने ही क्या..! अंदर टेबल पर बड़ी तहज़ीब के साथ आपने अपना बैग दीवार के सहारे रखा और मैं मेन्यू खंगालने लगा।

-क्या खाओगे?
-जो आपको पसंद है मंगा लो।
मेन्यू के सारे पन्ने उलट कर देखने के बाद जब कुछ समझ नहीं आता तो उसे आपकी ओर बढ़ा देता।
- आप ही देखो ना...।
उस दिन आपने दो अलग-2 तरीके की डिश मंगाई। एक मसाला डोसा और शायद उत्तपम... साथ में बटर मिल्क भी।
और हमारी बातचीत का सिलसिला शुरू होता था 'और बताओ'‌ से‌, जो‌ ' अमूमन क्या बताऊं ' पर खत्म हो जाता।
फिर आप एक‌टक देखते और मैं नज़रें चुराता।
- ऐसे न देखो यार।
- तो कैसे देखूं?
- नॉर्मल रहो यार, मुझे बड़ा अजीब लगता है, जब कोई ऐसे देखता है।
हंसते हुए - इतना तो मैं भी नहीं शरमाती...

इस बीच हमारा ऑर्डर आ चुका था‌।
हां, एक बात‌ तो रह ही गई। उस दिन शाम को ना... मुझे भूख लग आई थी। घर से निकलने से पहले कुछ खाकर निकला था। डिनर तो बस बहाना था।
पेट भरा था तो क्या खाता? दो-चार कौर के बाद मैं तो बटर मिल्क निपटाने लगा...  इतने में भोजन की ओर इशारा करते हुए आप बोले- इसे कौन खत्म करेगा?
- आप करोगी।
आपकी जिद पर एक- दो कौर और खा गया। डोसा आपने निपटाया और सांभर मैंने। फिर आप दिनभर का हाल बताने लगी। मैं, अच्छा और हां के साथ तारतम्यता बनाते हुए आपकी तस्वीरें उतारने लगा। यह उन्हीं में से एक है।

नक़्क़ाशीदार कांच के गिलास में रखे बटर मिल्क को स्ट्रॉ से पीती... और तिरछी नज़रों से मुझे देखती राजुला... जिसके नाज़ुक हाथों की अंगुलियां दस्तरख़ान बिछने से पहले और बाद में अक्सर मेरी हथेलियों को टटोलती रहती थी। आप अक्सर कहा करती थी- देखो, हमारी ये वाली लाइनें एक-सी हैं। संदेह जताने पर झल्ला कर कहती- बताओ कैसे एक-सी‌ नहीं हैं? याद है...? कई बार आप वेटर के आने तक भी मेरी हथेली को अपनी हथेली में भींचे न जाने किन ख़यालों में गुम रहती थीं। साथ होने की खुशी आपके चेहरे पर साफ देखी जा सकती थी।

खैर, सुनो ना... मैंने कभी आपको सजते-संवरते नहीं देखा। हालांकि इसकी कोई खास ज़रूरत भी नहीं थी। हां, कभी-कभार आप लाइनर और लिपिस्टिक ज़रूर यूज करती थीं, लेकिन होंठ चबाने की आदत सब किए धर पर पानी फेर देती है । मना करो... तो कहती हो- यार भूल जाती हूं मैं.. लेकिन इस बार आप आई ब्रो बनाकर आई थी।
आखिर बात‌ क्या है?
अरे थोड़ा- सा सेट करवाया है। अब लड़कियों वाली कुछ आदतें तो चाहिए ही।

पता है एक आदत और भी है आपकी। आपके रहते में कभी कोई बिल पे नहीं कर पाया और अब इसकी संभावनाएं भी माइनस जीरो हो चुकी हैं।

रेस्तरां से निकलने के बाद सीपी सर्कल के दो-तीन चक्कर तो हमेशा तय ही रहते थे। इसी दरम्यान आप  अपनी कहानियां सुनाते- "मैं... मेरे दोस्त, मेरे भाई... हम वहां गए... यहां गए.. हमने ये किया... वो किया.. अब ऐसा करना है... वैसा करना... आज ऑफिस में ये हुआ...वो हुआ... और अनंत बातें...।

और‌ याद है...! साढ़े दस बजे के बाद आपके घर से फोन आने शुरू हो जाते थे। फिर आप कहते- अब चलें?
- नहीं, एक राउंड और...
-व्यंग्य-सा कसते हुए... लेट हो रहा है यार। इतना ही टाइम स्पेंड करना होता है तो टाइम पर क्यों नहीं आते हो?
- हां यार ये तो है... कहते हुए मैं बात को टालने कोशिश करता.. कोई और बात छेड़ देता... होते-करते हम इस बीच एक चक्कर और मार लेते।

फिर अन्त‌ में घर की ओर निकलने से पहले, वो बैंच याद है जिस पर बैठ आप हाथों में हाथ लेकर मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश करते। हालांकि, अब तक न मैं आपसे दिल की कह पाया था और न आप...। फिर भी आप मेरी शर्ट के कॉलर को दुरस्त करते हुए मुस्कुराते। आँखें कई सवाल करतीं... कई मर्तबा लगता कि यह सही समय है, दिल की बयां कर देनी चाहिए... पर न जाने क्यों शब्द मौन धारण कर लेते, लेकिन हम दोनों के चेहरे कुछ न कह कर भी सब कुछ कह देते थे।

तंद्रा-सी तोड़ते हुए आप कहते- अब जाना है यार?
फिर हामी के सिवाय और कोई चारा भी नहीं रहता था। फिर तेज कदमों के साथ आप मेट्रो स्टेशन के गेट की ओर बढ़ते... अंत‌ में पलट कर देखने के बाद सीढ़ियाँ उतर जाते... और मैं उन लम्हों को संजोने वहीं बैठ जाता...।

बस इतना-सा है ये किस्सा।

आगे जारी है....✍️




~म्यार फस्क

(Note: जो "राजुला के नाम " का पहला हिस्सा नहीं पढ़ पाए हैं कृपया वे इस लिंक पर क्लिक करें। )


 

Sunday, 3 July 2022

मेर पहाड़



जब भी मैं बैठता हूं पहाड़ और प्रकृति के नज़दीक
देखता हूं -
क्षितिज से गिरते झरने कल-कल छल-छल
सुनाई देती है हवाओं की सूंसाट
और नदी/गाड़ों की भूंभाट
धारे के पानी की तड़तड़ाट
हरे- भरे पहाड़ों पर डोलते चीड़- देवदार
हुक्का भर चिलम पीते पहाड़।

संकरे रास्तों से जांठी के सहारे चढ़ते बूबू
आमा के सिर डाल्ली में भरा सामान
खेत साते बाज्यू और मेड़ सजती ईजा
दन्यावे पर बैठ मिट्टी में सन चुके बच्चे
ठुल बाज्यू के खेत में लगा हुड़किया बोल
दूसरे छोर पर बीड़ी पीकर‌ सुस्ताते काकज्यू
डांडों पर घास काटती महिलाएं,
उनकी न्यौली पर संगत करते पहाड़।

'खान खा ली'.... धाद लगाती परुवा की ब्योली
हो.. होई कह प्रत्युत्तर देता प्रकाश
आंगन में फुदकती 'ग्यांव' और घात लगाकर बैठी 'शिरू'
नारिंग के पेड़ों पर चहचहाते 'सिटौल'
और अनंत में रेस लगाते 'शूवे'
चीड़ के पेड़ों पर बैठ एक- दूसरे को खुजाते 'गूनी'
नीचे उतरने का इंतज़ार करती 'सिल्की'
पार वाली धार से नीचे 'काकड़' को पछेटता 'शेरू'
उज्याड़ खाती गाय, ओवान करती काखी
और उसे लेने दौड़ता केदार
ऐसा सतरंगी है मेर पहाड़।



Wednesday, 5 July 2017

पहली किश्त, बचपन की

पूष की एक शाम घाटी में एक छोटे-से टीले पर बैठे-बैठे मैं क्षितिज की ओर टकटकी लगाए देख रहा था। दूर पहाड़ पर चीड़ के पेड़ निःशब्द खड़े थे, सूर्य भी अपनी किरणें समेटने को था। तभी चिड़ियों का झुंड़ उड़ता हुआ आया और मेरी आंखों के सामने से ओझल हो गया। हवा की शीतलता गहराने लगी थी। हालांकि मैं दो-तीन ऊनी कपड़े पहने था फिर भी हवा उन्हें बेधकर बदन को ठिठुरा रही थी। गधेरे के पानी को ढलते सूरज की किरणें चमका रही थी, लग रहा था मानो किसी ने मुंह पर दर्पण लगा दिया हो। हवा तेज हो चली थी। गधेर के पास खड़े उतीश और मेव के पेड़ों की डालियां हिलने से बहता पानी भी झिलमिला-सा रहा था, एकाएक चमकता और ढक जाता। पीठ पीछे चीड़ के पेड़ों की पत्तियों पर हवा की सरसराहट और तेज हो गई। नीचे आम के पेड़ों के झुरमटों के बीच पक्षियों की चहचहाहट बता रही थी कि अब घर लौट चलो शाम अपने अंतिम पड़ाव पर है। बांयी ओर की धार में अचानक धूल का बवंडर आसमान की ओर उड़ता दिखाई दिया। धूल कुछ छटीं तो देखा गायों का झुंड़ दौड़ता हुआ नीचे की ओर आ रहा है, जो कुछ ही पलों में काफल के पेड़ों की ओट में गुम-सा हो गया। घाम अब चढ़ाई चढ़ते हुए दूर पहुंच चुका था। इतनी देर में आंखों के सामने से कुन्स्यावों का जोड़ा सरपट पास के झूड़ों में ओझल हो गया।उधर, पल्ले छोर पर पहाड़ों के ऊपर घने बादल अपना डेरा जमाए थे। तभी तेज हवा का झौंका सामने वाले पहाड़ से जा टकराया और इसी के साथ सूरज भी अस्त हो गया।

ज्यों ही सूर्य की किरणें शुभरात्रि कह गईं ठंड का अहसास और बढ़ा गईं। कुछ देर बाद नाक से पानी भी आने लगा। पोछने को हाथ बढ़ाया तो मालूम पड़ा कि नाक की डंठल भी सुन्न-सी हो गई है। सुना है कल रात नैनीताल की ओर बर्फ पड़ी थी। दो-चार दिनों में यहां भी पड़ने की उम्मीद है। अगास की ओर देखा तो चंद्रमा भी अपने साथ घेर लिए हुए आगे बढ़ रहा था। उधर बादल अपनी चकाचौंध दिखाते हुए अग्रसर हो रहे थे। ठीक ही किया जो बीती शाम लकड़ियां बंटोर ली, नहीं तो खाने पकाने के लिए मशक्कत करनी पड़ती। भीगी लकड़ियों से खाना बनाते ईजा की आंखें धुएं से नम हो जाती ना। खैर, अब अलाव धुंआ नहीं करेंगे।

अंधकार अपनी बिसात बिछा रहा था। मैं भी घर की ओर चल दिया। रूंड़ में आग जलाकर रात के भोजन की तैयारी करने लगा। इस बीच कमरा भी अच्छी तरह गर्म हो गया था।आसमानी बिजली आंगन के पाथरों पर पड़े पाले को चमका रही थी। सामने के जंगल में एक मैना बहुत देर से क्रंदन कर रही थी। लगता है उसका घरौंदा किसी बानर ने नष्ट कर दिया है। हवा थमने का नाम नहीं ले रही थी, जिसके कारण संतरे के पेड़ों पर बैठे पंछी लगातार चहचहा रहे थे। रात का पहला प्रहर बीतने को था। अभी तक ईजा और बाज्यू काम से नहीं लौटे थे। द्वार उघाड़कर देखा तो बाहर घुप्प अंधेरा था। टॉर्च लेकर उन्हें खोजने निकला तो सर्द हवाओं ने फिर पूरा बदन कंपा दिया। सारी गर्माहट छू हो गई। अभी सौ एक मीटर ही चला था, देखा सामने से कोई खतरनाक जीव मेरी ओर बढ़े चले आ रहा है। मैं थोड़ा सहम गया। कमबख्त टॉर्च की रोशनी भी वहां तक नहीं पहुंच रही थी। अचानक शेरू पूंछ हिलाते हुए सामने आ गया और उछल कूद शुरू कर दी। पुचकारने पर शांत हो गया। ईजा और बाज्यू भी अब पास ही पहुंच गए थे। ईजा के सिर पर रखा घास का गठ्ठर स्याह रात में किसी जंगली जानवर से कम नहीं लग रहा था। पिछले ही महीने तो बाग और शेरू की भिड़त हुई थी उस पल्ले वाले धार के खेत में, भाग अच्छे थे बच गया। खैर, अब जान पर जान आ गई थी। बाज्यू साथ हैं तो डरने की क्या बात है। फिर सब साथ हो लिए और जानवरों को चारा देन के बाद हम घर आ गए और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। ईजा ने पिनालू की सब्जी और मडुवे की रोटी पात दी साथ में दही का छसिया, वाह क्या लज़ीज खाना। ईजा के हाथों बना....

अब, वह सब बहुत याद आता है। मैं आज वहां नहीं हूं पर मन हर रोज उन पहाड़ों की सैर जरूर करता है। इस शहर में आए दस साल होने को हैं। यहां न दिन निकले का पता पड़ता है, न ही शाम ढलने का। दिनभर सड़कों पर गाड़ियों की भूंभाट और कान फोड़ू शोर-शराबा। जुलाई शुरू हो गया है। उमस भरी इन गर्मी के दिनों को काटना मेरे लिए अब भी बहुत दुष्कर है। चाहे घर के भीतर रहो या बाहर पसीने से लथपथ ही रहोगे। लेकिन अब कुछ आदत हो गई है यूं ही रहने की। कुछ परेशान भी होता हूं, पर मेरे पास अभी कोई दूसरा विकल्प नहीं है। तलाश जारी है... और इस उधेड़बुन में जब भी अकेला होता हूं तो बचपन आंखों में तैरने लगता है। जिसकी यह पहली किश्त थी और आज सार्वजनिक हो गई...।
   



फसकः भास्कर शर्मा



Monday, 15 August 2016

बग्वाल मेला (अषाढ़ी कौथिक)

एक-दूसरे को पत्थर मार कर लहूलुहान करने की परम्परा 

देवीधुरा के  खोलीखांड़- दुबाचौड़ मैदान में बग्वाल के लिए एकत्रित होते द्योत।


उत्तराखंड के देवीधुरा में रक्षाबंधन के मौके पर होता है “पाषाण युद्ध” 


जहां एक ओर पूरा देश रक्षाबंधन की तैयारियों में लगा है, वहीं दूसरी ओर अपनी नैसर्गिक सौंदर्य की छटा बिखेरने वाला उत्तराखंड एक बार फिर पाषाण युद्ध (बग्वाल मेला) के लिए तैयार है। आस्था के केंद्र मां बाराही मंदिर देवीधूरा, में होने वाले इस ऐतिहासिक युद्ध के अब कुछ ही दिन शेष हैं। श्रावण मास की पूर्णिमा को होने वाली 'बग्वाल' के लिए रणबांकुरे अपने संबंधियों को आमंत्रण भेजने लगे हैं। ढोल-दमाऊं के ताल कसे जाने के साथ-साथ मशकबीन, रणसिंहाओं की धूल झाड़ी जा रही है और छंतोलों (छत्र, फर) की सजावट का काम जारी है। बाजार सजने शुरू हो गए हैं। बग्वाल मेले को सफल बनाने के लिए जिला प्रशासन ने भी कमर कस ली है। पूरे देवीधुरा कस्बे पर सीसीटीवी कैमरों से लैस कर दिया गया है और चप्पा-चप्पा पुलिस की निगरानी में है। आपसी सद्भाव की इस जीती-जागती मिशाल को देखने विश्वभर से तमाम श्रद्धालु यहां पुहंचने शुरू हो गए हैं। नए नजर इस पाषाण युद्ध के इतिहास पर।


बग्वाल मेला (अषाढ़ी कौतिक)

यहां पत्थरों से खेली जाती है  “बग्वाल”
चंपावत जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित देवीधुरा, मां बाराही देवी मंदिर के प्रांगण (खोलीखांड़-दुबाचौड़) में प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा को मेला लगता है, जिसे स्थानीय भाषा में अषाढ़ी कौतिक भी कहते हैं। इसका सर्वाधिक आकर्षण हैः बग्वाल मेला। जिसमें चार खामों (दल) के लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। माना जाता है कि पत्थरों से चोट लगने के बाद बहा खून मां बाराही (पार्वती) को समर्पित हो गया। हालांकि इस मेले की पौराणिकता‌ को लेकर लोगों की राय एक नहीं हैं, फिर भी समझा जाता है कि नरबलि परम्परा का यह अधुनातन रूप है। ऐसी मान्यता है कि पृथ्वी में जब राक्षसों का आंतक बढ़ा तो वह बाराही के विग्रह (मूर्ति) को उठाकर रसातल में ले गए। हाहाकार मचने पर भगवान विष्णु ने बराह अवतार में उस दैत्य का उद्धार किया और मूर्ति भू लोक में ले आए। फिर जिस स्थान पर उसकी स्थापना की गई, वह बाराही सिद्धपीठ के नाम से विख्यात हुआ। मंदिर के महत्वपूर्ण स्थलों में खोलीखांड़-दुबाचौड़, मचवाल, गुफा के भीतर शक्ति पीठ (गबौरी), शंखचक्र घंटाधर गुफा और भीमशिला प्रमुख हैं।

कैसे हुई बग्वाल की शुरुआत

स्थानीय निवासी जगदीश जोशी बताते हैं- ऐसी मान्यताएं हैं कि हजारों वर्षों पहले जब राक्षसों का आतंक बढ़ गया था, तो देवी के गणों ने राक्षसों से मुक्ति के बदले प्रजा से नर बलि की मांग की, जिसके बाद स्थानीय लमगड़िया, चम्याल, गहड़वाल और वाल्किया (खाम) कुलों के लोग क्रमशः अपने लोगों की बलि देते थे। उन्होंने बताया कि एक बार बलि के लिए चम्याल कुल के एक ऐसे परिवार की बारी आई जिसका केवल एक ही पुत्र था। परिवार की मुखिया (एक वृद्धा) ने उसे बचाने के लिए तपस्या शुरू कर दी, जिससे प्रसन्न होकर मां बाराही ने कहा कि यदि चारों कुलों के लोग मंदिर प्रांगण में एकत्र होकर युद्ध कौशल दिखाएं, इस दौरान जब एक युवक के रक्त के बराबर खून बह जाए तो युद्ध बंद कर दिया जाए। इससे गण प्रसन्न हो जाएंगे और नरबलि से छुटकारा मिल जाएगा। उस काल में स्थानीय लोग अश्म युद्ध यानी पत्थर मार कर किए जाने वाले युद्ध में प्रवीण थे। तब से पत्थर मार युद्ध यानी बग्वाल शुरू हुई और खोलीखांड- दूबाचौड़ का मैदान विश्व प्रसिद्ध हो गया। हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा को यहां 'अश्म वृष्टि' होती है।

अश्म था योद्धाओं का हथियार

इतिहास के जानकारों की मानें तो महाभारत काल में पर्वतीय क्षेत्रों में निवास कर रही एक जाति ऐसी थी जो अश्म युद्ध (पत्थर मार युद्ध) में प्रवीण थी और इन योद्धाओं ने पाण्डवों की ओर से महाभारत के युद्ध में भाग लिया था। जो इस बात को पुष्ट करती है कि यह प्रथा पुरातन काल से चली आ रही है।

पुजारी के इशारे पर शुरू होती है “बग्वाल”

युद्ध से पहले चारों खामों के लोग अपनी टोलियों से साथ पूरे मंदिर परिसर की परिक्रमा करते हैं। ढोल-नगाड़ों का नाद, शंख-घंटों की टंकार और मां की जयकार के साथ द्योत उछलते- कूदते पूरे जोशो-खरोश के साथ खोलीखाड़-दुबाचौड़ मैदान में एक-एक कर प्रवेश करते हैं। पीली पगड़ी पहने द्योत (बग्वाल खेलने वाले), हाथों में छंतोले (छत्र) लिए जब प्रांगण में आकर प्रतिद्वंद्वियों की टोह लेना शुरू करते हैं तो ऐसा लगता है कि मानो योद्धाओं की फौज व्यूह रचना कर रही हो। वालिक्या और लगमड़िया खाम पश्चिमी छोर से तो चम्याल और गहड़वाल पूर्वी छोर से रणभूमि में गर्जन करते नजर आते हैं। आसमां जयकारों और रणबांकुरों की ललकार से गुंजायमान हो जाता है। मंदिर के पुजारी से संकेत मिलने के बाद गहड़वाल खाम के द्योत सबसे पहले पत्थर मारते हैं और फिर शुरू हो जाता है द्वंद्व।
 खोलीखांड़-दुबाचौड़ मैदान में बग्वाल के दौरान छंतोलों के नीचे आकर
पत्थरों से बचने का प्रयास करते द्योत।

कुछ समय के लिए खोलिखाड़-दुबाचौड़ मैदान के ऊपर केवल पत्थरों की आवाजाही दिखती है। सरसराते पत्थर जब द्योतों के ऊपर गिरते हैं तो खून की बहती धार, उनका उत्साह और बढ़ा देती है। लाखों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालु दशर्क दीर्घा से इस “बग्वाल” के गवाह बनते हैं, जो जयकारों से द्योतों का उत्साह बढ़ाते नजर आते हैं।
जब पुजारी को आभास हो जाता है कि एक व्यक्ति के रक्त के बराबर लहू बह चुका है तो वह बिना किसी सुरक्षा कवच के लड़ाई के मैदान में पहुंच, शंख बजाकर युद्ध समाप्ति की घोषणा करते हैं। हालांकि खामों में लोग एक-दूसरे के मित्र या सगे-संबंधी ही होते हैं परंतु रणभूमि में कुछ देर लिए वह सभी नाते-रिश्ते भूल कर परम्परा का निर्वाह करते हैं। कहा जाता है कि 1945 से पहले युद्ध के दौरान पत्थरों से बचने के लिए फरों (छंतोला,छत्र) का प्रयोग नहीं किया जाता था।

जब उठता है सिंहासन डोला

किंवदंतियां हैं कि मां बाराही की प्रतिमा का तेज इतना है कोई भी उन्हें खुली आंखों से देख नहीं आज तक नहीं देख पाया। जो भी ऐसा दुस्साहस करता है, वह अंधा हो जाता है। स्थानीय निवासी घनश्याम शर्मा ने बताया कि श्रावणी पूर्णिमा के दूसरे दिन बक्से में रखे देवी विग्रह (प्रतिमा) को मंदिर के मुख्य पुजारी भी आंखों में पट्टी बांधकर नहलाते हैं और उसके बाद सिंहासन (डोले) पर उन्हें सजाकर शोभा यात्रा निकाली जाती है। जब लोग माता के डोले को कंधों में उठाकर उनके मायके, मचवाल की ओर चलना शुरू करते हैं तो पीछे से श्रृद्धालुओं का कारवां भी साथ चलता है। कहा जाता है कि जब माता का डोला वापस खोलीखांड़-दूबाचौड़ पहुंचता है तो बारिश होती है। मान्यता है कि यह बारिश मायका छोड़ने के दुख में देवी की आंखों से निकले आंसू हैं।

निर्मम जानवरों की बलि

मान्यता है कि देवी को अठ्वार (अष्ठ बलि) देने से वह खुश होती हैं। लोग मन्नत पूरी होने के बाद अठ्वार में सात बकरों और एक भैंसे की बलि देते हैं। बकरों के मांस को तो लोग खा लेते हैं लेकिन भैंसे को यूं ही छोड़ देते हैं। कुछ साल पहले उच्च न्यायालय ने आस्था के नाम पर जानवरों की निर्मम हत्या पर संज्ञान लेते हुए भैंसे की बलि पर रोक लगा दी।

बदलने लगा है बग्वाल का प्रतिरूप

वर्षों से चली रही एक परंपरा (पाषाण युद्ध) के दौरान घायलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रशासन ने युद्ध के तौर-तरीकों में बदलाव कर दिए हैं। बग्वाल मेले के इतिहास में पहली बार साल 2013 में चारों खामों (दल) के रणबांकुरों ने पत्थरों की बजाय फलों (गोल नाशपाती) से बग्वाल खेली। हालांकि कुछ ही देर में द्योतों ने एक–दूसरे पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए थे। आंकड़े बताते हैं कि उस साल प्रशासन की सख्ताई के बावजूद लगभग 80 लोग घायल हुए थे। बीते वर्ष भी पत्थरों की मार से कई लोग घायल हो गए थे। स्थानीय निवासी जगदीश बताते हैं कि बग्वाल खेलने वालों को पिछले तीन दिनों से खुद को पाक रखना पड़ता है। उन्हें सभी तरीके के गरिष्ठ भोजनों को तिलांजलि देनी पड़ती है, जो लोग बिना त्याग किए बग्वाल खेलते हैं अक्सर उन्हें ही गंभीर चोट पहुंचती है।

कैसे पहुंचे “अषाढ़ी कौतिक”

महाभारत काल में पांडवों से जुड़ी अनेक घटना का गवाह, माँ बाराही धाम सुमद्रतल से लगभग 6500 फिट की ऊँचाई पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए काठगोदाम तक ट्रेन या बस के जरिए और उसके बाद 111 किलो मीटर का रास्ता स्थानीय गाड़ियों या टैक्सी/कैब से नापा जा सकता है।
खाेलीखांड़ दुबाचौड़ का मैदान।  फोटो ः चंद्र शेखर  द्विवेदी

फसक ः भास्कर शर्मा