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Monday, 12 June 2023

सीपी सर्कल की किस्सागोई

राजुला के नाम भाग -2

शुक्रवार का दिन था। सुबह लगभग 10 बजे नींद खुली.. लेकिन अलसाहट अब भी बाकी थी। किस्मत भली थी आज वीक ऑफ था। कुछ देर और सोने के बाद लगा अब नींद पूरी हो चुकी है... उठ जाना चाहिए। लेटे हुए ही मोबाइल फोन खोजने के लिए हाथों से बिस्तर टटोला... तो पाया वह सिरहाने के एक कोने पर पड़ा है। ऑन किया... तो देखता हूं... आपकी छह मिस्डकॉल... और तीन मैसेज, सुबह पांच बजे‌ के आए हुए हैं। उससे ठीक एक घंटा पहले ही तो मैं फोन साइलेंट कर सोया था। रिप्लाई करने के बाद पता नहीं क्यों... अंगुलियां फोन की गैलरी की ओर बढ़ गईं। तभी नज़र एक फोटो पर आकर टिक गई। ठीक-ठीक तो याद नहीं पर शायद 2015 की बात रही होगी। मार्च खत्म होने को था और गर्मियां उरूज पर जाने को बेताब.... इत्फ़ाकन उस दिन भी ऑफिस की छुट्टी थी। फोन पर आपसे बात‌ हुई... तो सीपी में डिनर को प्रोग्राम तय हो गया।
हर बार की तरह मैं फिर से लेट था। इस बार भी पूरी भूमिका बनाकर तयशुदा जगह (राजीव चौक मेट्रो स्टेशन) पहुंचा था कि मामला संभालना कैसे है, लेकिन उसका बहुत ज्यादा फ़ायदा होता नहीं था। आपको जो कहना-सुनाना होता, आप एक ही सांस में कह डालते थे। मुझे तल्ख लहज़े वाले आपके चेहरे के भाव अब भी ठीक से याद हैं। आप कहते  - "हमेशा लेट...! कभी टाइम पर तो आना ही नहीं है। आधे- आधे घंटे वेट करवाते हो.. अगली बार अब मिलने के लिए बोलना मत...। " और ना जाने क्या-क्या... उसके बाद भी जो कुछ छूट जाता...उसकी कसर आंखें पूरी कर देती थी। मैं हमेशा की तरह कहता- "यार अगली बार पक्का टाइम पर आऊंगा"... आप डपट कर कहते-" रहने दो... कभी नहीं सुधरोगे आप... अब चलो।" दो चार कदम चलने के बाद आप कुछ ऐसे पेश आते जैसे कुछ हुआ ही न हो.. " अच्छा सुनो ना.. यार जब मैं आ रही थी ना.. पता है क्या हुआ.. और फिर कभी खत्म न होने वाली बातें.. मैं अच्छा.. सच्ची.. फिर क्या हुआ.. से आगे कभी नहीं गया। हालांकि, कुछ और कहने का मौका मिलता भी नहीं था और सच पूछो तो इसकी जरूरत भी नहीं थी। जब सामने से कोई कुछ कह रहा हो.. तो आदर्श स्थिति तो यही कहती है कि आप उसे सुनते रहें।

साल की वह दूसरी या तीसरी मुलाकात रहेगी होगी, जब मुझे देरी के लिए आपसे सुनना पड़ता था। माथे का बल और उभरी भौंह यह बताने के लिए काफी थी कि आज कुछ तगड़ा टॉनिक मिलने वाला है। भले ही मैं आने में अक्सर देरी कर देता था, लेकिन मैंने जानबूझकर ऐसा कभी नहीं किया। दरअसल क्या है ना.. पहले ये दिल्ली के ऑटो और जाम परेशान करते हैं, फिर रही सही कसर मेट्रो के 20 मिनट पूरी कर देते हैं। जब देरी का एहसास होता है तो लगता है समय बहुत‌ तेजी से भाग रहा है और स्टेशन है कि आने का नाम नहीं ले रहा है। कभी-कभी यलो लाइन में कोई तकनीकी दिक्कत आ जाए तो...घोर विपदा!

सुनो, वो वाला किस्सा याद है.. जिस दिन हम एनएसडी गए थे। उस दिन भी इंतजार किया था किसी ने.. बस किरदार बदल गया था। आपने पूरे 35 मिनट वेट करवाया और जब हम मिले तो आपने ताना देते हुए कहा- "पता चला..कैसा लगता है इंतज़ार कराना?"
यार एक तो लेट आ रही हो.. मैं कुछ और कहता इससे पहले आप बोल पड़ी ~ मुझे ऐसा क्यों लग रहा है आप बस अभी-अभी पहुंचे हो..?
नहीं, आधे घंटे से ज्यादा हो गया।
ये हो ही नहीं सकता.. अगर आप आए होते.. तो अब तक तो 50 कॉल कर दिए होते।
मुझे एक मौका मिला था.. कुछ सुनाने का... वो भी जाता रह गया।

खैर, मेट्रो के गेट नम्बर-6 से बाहर निकलने के बाद हम जनपथ लेन की और बढ़ रहे थे। उस दिन गहरे नीले रंग के प्रिंटेड सूट में थे आप। सिर के बाल बंधे थे। लंबे इतने कि खोल दो तो करधनी को छू लें। कुंडलों ने कानों पर अनावश्यक भार दे रखा था। कितनी बार कहा है... क्या ज़रूरत है इतने भारी इयररिंग्स पहनने की? लेकिन आप किसी की सुनते कहां हो?

लगभग 10 मिनट बाद हम रेस्तरां के सामने थे। साढ़े आठ बजने को होंगे, लेकिन तपिश कम होने का नाम नहीं ले रही थी। ऊपर से अंदर जाने के लिए 20 मिनट का इंतजार... और बड़ी आफ़त..। इससे बचने के लिए हम जनपथ लेन के दो-तीन चक्कर मार लेते थे। अंत‌ में भीड़ को चीर कर आप गार्ड के पास‌ जाकर पता करते ' भइया नम्बर कब आएगा?' मैं पास ही खड़ा इंतजार कर ही रहा था कि गार्ड ने आपका नाम लिया। इतने में आप पास आईं और हाथ पकड़ कर बोलीं- चलो नम्बर आ गया। गर्मी के मौसम में एसी की हवा और आपका साथ हो तो कहने ही क्या..! अंदर टेबल पर बड़ी तहज़ीब के साथ आपने अपना बैग दीवार के सहारे रखा और मैं मेन्यू खंगालने लगा।

-क्या खाओगे?
-जो आपको पसंद है मंगा लो।
मेन्यू के सारे पन्ने उलट कर देखने के बाद जब कुछ समझ नहीं आता तो उसे आपकी ओर बढ़ा देता।
- आप ही देखो ना...।
उस दिन आपने दो अलग-2 तरीके की डिश मंगाई। एक मसाला डोसा और शायद उत्तपम... साथ में बटर मिल्क भी।
और हमारी बातचीत का सिलसिला शुरू होता था 'और बताओ'‌ से‌, जो‌ ' अमूमन क्या बताऊं ' पर खत्म हो जाता।
फिर आप एक‌टक देखते और मैं नज़रें चुराता।
- ऐसे न देखो यार।
- तो कैसे देखूं?
- नॉर्मल रहो यार, मुझे बड़ा अजीब लगता है, जब कोई ऐसे देखता है।
हंसते हुए - इतना तो मैं भी नहीं शरमाती...

इस बीच हमारा ऑर्डर आ चुका था‌।
हां, एक बात‌ तो रह ही गई। उस दिन शाम को ना... मुझे भूख लग आई थी। घर से निकलने से पहले कुछ खाकर निकला था। डिनर तो बस बहाना था।
पेट भरा था तो क्या खाता? दो-चार कौर के बाद मैं तो बटर मिल्क निपटाने लगा...  इतने में भोजन की ओर इशारा करते हुए आप बोले- इसे कौन खत्म करेगा?
- आप करोगी।
आपकी जिद पर एक- दो कौर और खा गया। डोसा आपने निपटाया और सांभर मैंने। फिर आप दिनभर का हाल बताने लगी। मैं, अच्छा और हां के साथ तारतम्यता बनाते हुए आपकी तस्वीरें उतारने लगा। यह उन्हीं में से एक है।

नक़्क़ाशीदार कांच के गिलास में रखे बटर मिल्क को स्ट्रॉ से पीती... और तिरछी नज़रों से मुझे देखती राजुला... जिसके नाज़ुक हाथों की अंगुलियां दस्तरख़ान बिछने से पहले और बाद में अक्सर मेरी हथेलियों को टटोलती रहती थी। आप अक्सर कहा करती थी- देखो, हमारी ये वाली लाइनें एक-सी हैं। संदेह जताने पर झल्ला कर कहती- बताओ कैसे एक-सी‌ नहीं हैं? याद है...? कई बार आप वेटर के आने तक भी मेरी हथेली को अपनी हथेली में भींचे न जाने किन ख़यालों में गुम रहती थीं। साथ होने की खुशी आपके चेहरे पर साफ देखी जा सकती थी।

खैर, सुनो ना... मैंने कभी आपको सजते-संवरते नहीं देखा। हालांकि इसकी कोई खास ज़रूरत भी नहीं थी। हां, कभी-कभार आप लाइनर और लिपिस्टिक ज़रूर यूज करती थीं, लेकिन होंठ चबाने की आदत सब किए धर पर पानी फेर देती है । मना करो... तो कहती हो- यार भूल जाती हूं मैं.. लेकिन इस बार आप आई ब्रो बनाकर आई थी।
आखिर बात‌ क्या है?
अरे थोड़ा- सा सेट करवाया है। अब लड़कियों वाली कुछ आदतें तो चाहिए ही।

पता है एक आदत और भी है आपकी। आपके रहते में कभी कोई बिल पे नहीं कर पाया और अब इसकी संभावनाएं भी माइनस जीरो हो चुकी हैं।

रेस्तरां से निकलने के बाद सीपी सर्कल के दो-तीन चक्कर तो हमेशा तय ही रहते थे। इसी दरम्यान आप  अपनी कहानियां सुनाते- "मैं... मेरे दोस्त, मेरे भाई... हम वहां गए... यहां गए.. हमने ये किया... वो किया.. अब ऐसा करना है... वैसा करना... आज ऑफिस में ये हुआ...वो हुआ... और अनंत बातें...।

और‌ याद है...! साढ़े दस बजे के बाद आपके घर से फोन आने शुरू हो जाते थे। फिर आप कहते- अब चलें?
- नहीं, एक राउंड और...
-व्यंग्य-सा कसते हुए... लेट हो रहा है यार। इतना ही टाइम स्पेंड करना होता है तो टाइम पर क्यों नहीं आते हो?
- हां यार ये तो है... कहते हुए मैं बात को टालने कोशिश करता.. कोई और बात छेड़ देता... होते-करते हम इस बीच एक चक्कर और मार लेते।

फिर अन्त‌ में घर की ओर निकलने से पहले, वो बैंच याद है जिस पर बैठ आप हाथों में हाथ लेकर मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश करते। हालांकि, अब तक न मैं आपसे दिल की कह पाया था और न आप...। फिर भी आप मेरी शर्ट के कॉलर को दुरस्त करते हुए मुस्कुराते। आँखें कई सवाल करतीं... कई मर्तबा लगता कि यह सही समय है, दिल की बयां कर देनी चाहिए... पर न जाने क्यों शब्द मौन धारण कर लेते, लेकिन हम दोनों के चेहरे कुछ न कह कर भी सब कुछ कह देते थे।

तंद्रा-सी तोड़ते हुए आप कहते- अब जाना है यार?
फिर हामी के सिवाय और कोई चारा भी नहीं रहता था। फिर तेज कदमों के साथ आप मेट्रो स्टेशन के गेट की ओर बढ़ते... अंत‌ में पलट कर देखने के बाद सीढ़ियाँ उतर जाते... और मैं उन लम्हों को संजोने वहीं बैठ जाता...।

बस इतना-सा है ये किस्सा।

आगे जारी है....✍️




~म्यार फस्क

(Note: जो "राजुला के नाम " का पहला हिस्सा नहीं पढ़ पाए हैं कृपया वे इस लिंक पर क्लिक करें। )


 

Friday, 21 January 2022

राजुला के नाम... ✍

कुछ वर्ष पूर्व लिखी गई यह रचना आज किताबों को खंगाते हाथ लगी। क्या दिन थे...! उन दिनों लिखने की चाह ऐसी थी कि कुछ ही समय में कई पन्ने रंग जाते थे। कुछ जबरन लिखवाए जाते तो कुछ ऑन डिमांड तैयार किए जाते थे। दरअसल, यह रचना एक अनाम उपन्यास का हिस्सा है, लेकिन किन्हीं कारणों से वह उपन्यास अधूरा रह गया। सोचता हूं अब इस प्लेटफॉर्म के जरिए उसके अंश आप तक पहुंचाता चलूं। यह रचना उपन्यास का उत्तरार्ध है, जिसे शुरुआत में लेखन के प्रवाह को बनाए रखने के लिए उत्तम पुरुष में लिखा गया था। अब इसे ठीक वैसे ही पेश कर रहा हूं।

नायक- नायिका अलग- अलग राह पकड़ चुके हैं। हालांकि सुना तो ऐसा भी गया कि सहमति से दोनों ने यह रास्ता चुना... लेकिन किसी भी एंगल से लगता नहीं था कि यह विच्छेद म्यूचुअल‌ डिसीजन था, जिसकी खास तौर पर नायक चर्चा कर साथियों के बीच खुद को सामान्य दिखाने की असफल कोशिश करता था। 

इधर, दिन बीते... फिर हफ्ते और हर ढलते‌ दिन के साथ नायिका के वियोग में नायक बचैन हो जाता है। हर समय वह नायिका के साथ बिताए पलों को याद कर मन ही मन सही-गलत की पहेली में उलझा रहता। मन में चल रही ऊहापोह को "नायिका के नाम ख़त" लिख कर शांत करने का प्रयत्न करता। हालांकि वह जानता है कि दूरियां अब इतनी हैं कि ख़त लिखने का कोई औचित्य ही नहीं है, लेकिन यह दौर उसके 'देवानंदपन' का है। इसलिए मन को कैसे भी कर के समझाने का यत्न करता है। उम्मीद है इस सफ़र में आप भी नायक के‌ हम‌सफ़र बनेंगे और अन्त‌‌ में यथार्थ से रू-ब-रू होंगे ।



प्रिय
      राजुला

      मुझे ठीक से तो याद नहीं... लेकिन शायद 2013 के नवंबर या दिसंबर का वक़्त रहा होगा जब फेसबुक के ज़रिए हमारी बातों का सिलसिला शुरू हुआ था और पिछले दिनों ही आपका 'आखिरी ख़त' भी मिला। अच्छा लगा एक बार फिर फ्लैश बैक में जाने से पुरानी यादें ताजा हो गईं। एक बात तो है... अब आप और अच्छा लिखने लगी हैं। एक समय वह भी था जब आप मुझसे हिंदी पढ़ने की बात किया करते थे, जिसे मैं तो पढ़ा नहीं पाया... पर आप मुझे ज़िन्दगी जीने का सलीका सिखा गईं। आपने बताया कि कैसे छोटी- छोटी बातों से दूसरों को खुशियाँ दी जा सकती हैं। 

पता है... आपका चेहरा‌‌ ना... सबसे जुदा है... जो देखे देखता रह जाए... बड़ी- बड़ी आंखें, दमकता ललाट, हमेशा गुलाबी रहने वाले होंठ और थोड़ी चपटी नाक.... जो आपको पहाड़ी टच देती है। सुनो तो... गौर से देखने पर लगता है अब वह थोड़ी- सी टेढ़ी भी हो चली है। खैर... जो भी हो मुझे बहुत पसंद है। इन बीते सालों में एक दौर ऐसा भी आया कि आप मेरी सुबह- शाम बन गए थे। आपको तो पता ही है, दिन की शुरुआत से रात के आख़िरी प्रहर तक शायद ही ऐसा कोई पल रहा हो जब हम एक- दूसरे से दूर रहे हों। 

आप में कुछ तो ऐसा था जो सब में नहीं होता, तभी तो जब कहने को कुछ भी नहीं होता था उसके बावजूद भी 'हम्म.... हां...', 'और बताओ' में हमारे कई घंटे निकल जाते और पता भी नहीं चलता था। आधी रात से सुबह तक की चैटिंग नोकिया 1600 की मैमोरी दो-चार बार फुल करने के लिए काफी थी। और हां... भौतिक रूप से मिलने का एक मात्र संस्थान- होटल सर्वणा को कैसे भूल सकते हैं, जिसके वेटर हमारी पसंद का भोजन खुद ही ले आते थे। यह एक ऐसी जगह थी जहां आप खाना खाने की बजाय मुझे एक टक देेखते रहते... मैं कहता- राजुुुला‌ बस भी करो सब यहीं देख रहे हैं।

याद है...! जब मैं शहर के पल्ले वाले मोड़ तक आपको छोड़ने आया था। हां... उसी दिन जब सांझ हो आई थी। बस‌ से उतरने के बाद हम कुछ दूर तक‌ साथ चले और अंधेरा छाने लगा था। स्ट्रीट लाइट के उजाले‌ में आपका चेहरा दमक रहा था। साथ होने की ख़ुशी उसमें साफ झलक रही थी। घर पास आने पर आप कहते‌ - अब लौट जाओ मैं चली जाऊंगी, बस चार कदम और चलना है... लेकिन ज़िद थी घर तक छोड़कर आना है। अंत में जब आपको छोड़ने की बारी आती थी तो चेहरा सारा सच बयां कर देता था। मन कहता - काश ये शाम कुछ देर ठहर जाए... मैं थोड़ा और वक़्त अपनी राजुला के साथ बिता सकूं। लेकिन कई मामलों में शाम भी निष्ठुर हो जाती है। वह मेरी क्या, किसी की भी नहीं सुनती। ऐसे मेें थोड़ी-सी ज़िद बहुत काम आती थी और अंत में बिछुड़न...

सच‌ कहूं तो तब से लेकर आज तक मैं किसी से कभी कोई ज़िद नहीं कर पाया, क्योंकि ये आप थे जो कहने से पहले मेरी हर बात समझ जाते। मेरे लिए आप एक‌ इंसान थे- 

जो हर संभव मेरे साथ रहता है
मेरी हर नादान चाह पूरी करता है
जो मुझमें ही रहता, मेरा ही गीत गाता है
मेरी वेदनाओं की संवेदना, मेरे रूह का आफ़ताब... 
मन करता है घंटों सामने बैठा रहूं और आपको सुनता रहूं। 

याद है... एक बार जब हम बस से सफ़र कर रहे थे तो मेरे शहर छोड़ने की बात‌‌ सुनकर आपकी आंखें‌ डबडबा गई थीं और गला रुध गया था।‌ कुछ कहना चाहते थे आप, पर केवल मेरा नाम ही ले पाए। लंबी सांस लेकर आपने ख़ुद को सामान्य दिखाने की कोशिश की। मैं आपके मन में चल रही ऊहापोह को‌ समझ तो गया था पर अफसोस...! उसे जाहिर नहीं कर पाया। 

मुझे ना आपका लड़ना-झगड़ना यहां तक कि कई बातों को लेकर ताना देना भी पसंद है। ऐसी कोई बात नहीं जो इस चाह को ज़रा-सा भी कम कर दे। हालांकि अब आप साथ नहीं हो.. लेकिन लगता है दूर रहकर भी पास हो।
एक बात तो तय है आपके दूर हो जाने के बाद अब मेरे ख़्वाब... ख़्वाब ही रहेंगे। सुबह से लेकर शाम तक और शाम से लेकर सुबह तक आपसे बातें करने का ख़्वाब ।
जीभर के देखने, तुम्हारे बालों से खेलने का ख़्वाब ।
हाथों में हाथ लेकर उस‌ पल्ले वाले छोर तक जाने का ख़्वाब। शायद यही हमारा प्रारब्ध था।

इस सब के बावजूद आज भी मेरे लिए आप वही हो-

जो मुझे मुझसे भी ज्यादा जानता है।
मेरे हर सवाल का जवाब, मेरे पार्थिव का प्राण
तुम बिन मैं कुछ भी नहीं केवल खूंट-ठूंठ के। 

आप थे तो बागों में बहार थी, सावन की महकार के साथ बसंत की फुहार भी... पर अब ये दौर पतझड़ का है और यह जीवन का एक अर्ध सत्य...। 

सदा तुम्हारा




                      ©Bhaskar Sharma 

                                 ©म्यार फस्क