Sunday, 3 July 2022

मेर पहाड़



जब भी मैं बैठता हूं पहाड़ और प्रकृति के नज़दीक
देखता हूं -
क्षितिज से गिरते झरने कल-कल छल-छल
सुनाई देती है हवाओं की सूंसाट
और नदी/गाड़ों की भूंभाट
धारे के पानी की तड़तड़ाट
हरे- भरे पहाड़ों पर डोलते चीड़- देवदार
हुक्का भर चिलम पीते पहाड़।

संकरे रास्तों से जांठी के सहारे चढ़ते बूबू
आमा के सिर डाल्ली में भरा सामान
खेत साते बाज्यू और मेड़ सजती ईजा
दन्यावे पर बैठ मिट्टी में सन चुके बच्चे
ठुल बाज्यू के खेत में लगा हुड़किया बोल
दूसरे छोर पर बीड़ी पीकर‌ सुस्ताते काकज्यू
डांडों पर घास काटती महिलाएं,
उनकी न्यौली पर संगत करते पहाड़।

'खान खा ली'.... धाद लगाती परुवा की ब्योली
हो.. होई कह प्रत्युत्तर देता प्रकाश
आंगन में फुदकती 'ग्यांव' और घात लगाकर बैठी 'शिरू'
नारिंग के पेड़ों पर चहचहाते 'सिटौल'
और अनंत में रेस लगाते 'शूवे'
चीड़ के पेड़ों पर बैठ एक- दूसरे को खुजाते 'गूनी'
नीचे उतरने का इंतज़ार करती 'सिल्की'
पार वाली धार से नीचे 'काकड़' को पछेटता 'शेरू'
उज्याड़ खाती गाय, ओवान करती काखी
और उसे लेने दौड़ता केदार
ऐसा सतरंगी है मेर पहाड़।



Friday, 21 January 2022

राजुला के नाम... ✍

कुछ वर्ष पूर्व लिखी गई यह रचना आज किताबों को खंगाते हाथ लगी। क्या दिन थे...! उन दिनों लिखने की चाह ऐसी थी कि कुछ ही समय में कई पन्ने रंग जाते थे। कुछ जबरन लिखवाए जाते तो कुछ ऑन डिमांड तैयार किए जाते थे। दरअसल, यह रचना एक अनाम उपन्यास का हिस्सा है, लेकिन किन्हीं कारणों से वह उपन्यास अधूरा रह गया। सोचता हूं अब इस प्लेटफॉर्म के जरिए उसके अंश आप तक पहुंचाता चलूं। यह रचना उपन्यास का उत्तरार्ध है, जिसे शुरुआत में लेखन के प्रवाह को बनाए रखने के लिए उत्तम पुरुष में लिखा गया था। अब इसे ठीक वैसे ही पेश कर रहा हूं।

नायक- नायिका अलग- अलग राह पकड़ चुके हैं। हालांकि सुना तो ऐसा भी गया कि सहमति से दोनों ने यह रास्ता चुना... लेकिन किसी भी एंगल से लगता नहीं था कि यह विच्छेद म्यूचुअल‌ डिसीजन था, जिसकी खास तौर पर नायक चर्चा कर साथियों के बीच खुद को सामान्य दिखाने की असफल कोशिश करता था। 

इधर, दिन बीते... फिर हफ्ते और हर ढलते‌ दिन के साथ नायिका के वियोग में नायक बचैन हो जाता है। हर समय वह नायिका के साथ बिताए पलों को याद कर मन ही मन सही-गलत की पहेली में उलझा रहता। मन में चल रही ऊहापोह को "नायिका के नाम ख़त" लिख कर शांत करने का प्रयत्न करता। हालांकि वह जानता है कि दूरियां अब इतनी हैं कि ख़त लिखने का कोई औचित्य ही नहीं है, लेकिन यह दौर उसके 'देवानंदपन' का है। इसलिए मन को कैसे भी कर के समझाने का यत्न करता है। उम्मीद है इस सफ़र में आप भी नायक के‌ हम‌सफ़र बनेंगे और अन्त‌‌ में यथार्थ से रू-ब-रू होंगे ।



प्रिय
      राजुला

      मुझे ठीक से तो याद नहीं... लेकिन शायद 2013 के नवंबर या दिसंबर का वक़्त रहा होगा जब फेसबुक के ज़रिए हमारी बातों का सिलसिला शुरू हुआ था और पिछले दिनों ही आपका 'आखिरी ख़त' भी मिला। अच्छा लगा एक बार फिर फ्लैश बैक में जाने से पुरानी यादें ताजा हो गईं। एक बात तो है... अब आप और अच्छा लिखने लगी हैं। एक समय वह भी था जब आप मुझसे हिंदी पढ़ने की बात किया करते थे, जिसे मैं तो पढ़ा नहीं पाया... पर आप मुझे ज़िन्दगी जीने का सलीका सिखा गईं। आपने बताया कि कैसे छोटी- छोटी बातों से दूसरों को खुशियाँ दी जा सकती हैं। 

पता है... आपका चेहरा‌‌ ना... सबसे जुदा है... जो देखे देखता रह जाए... बड़ी- बड़ी आंखें, दमकता ललाट, हमेशा गुलाबी रहने वाले होंठ और थोड़ी चपटी नाक.... जो आपको पहाड़ी टच देती है। सुनो तो... गौर से देखने पर लगता है अब वह थोड़ी- सी टेढ़ी भी हो चली है। खैर... जो भी हो मुझे बहुत पसंद है। इन बीते सालों में एक दौर ऐसा भी आया कि आप मेरी सुबह- शाम बन गए थे। आपको तो पता ही है, दिन की शुरुआत से रात के आख़िरी प्रहर तक शायद ही ऐसा कोई पल रहा हो जब हम एक- दूसरे से दूर रहे हों। 

आप में कुछ तो ऐसा था जो सब में नहीं होता, तभी तो जब कहने को कुछ भी नहीं होता था उसके बावजूद भी 'हम्म.... हां...', 'और बताओ' में हमारे कई घंटे निकल जाते और पता भी नहीं चलता था। आधी रात से सुबह तक की चैटिंग नोकिया 1600 की मैमोरी दो-चार बार फुल करने के लिए काफी थी। और हां... भौतिक रूप से मिलने का एक मात्र संस्थान- होटल सर्वणा को कैसे भूल सकते हैं, जिसके वेटर हमारी पसंद का भोजन खुद ही ले आते थे। यह एक ऐसी जगह थी जहां आप खाना खाने की बजाय मुझे एक टक देेखते रहते... मैं कहता- राजुुुला‌ बस भी करो सब यहीं देख रहे हैं।

याद है...! जब मैं शहर के पल्ले वाले मोड़ तक आपको छोड़ने आया था। हां... उसी दिन जब सांझ हो आई थी। बस‌ से उतरने के बाद हम कुछ दूर तक‌ साथ चले और अंधेरा छाने लगा था। स्ट्रीट लाइट के उजाले‌ में आपका चेहरा दमक रहा था। साथ होने की ख़ुशी उसमें साफ झलक रही थी। घर पास आने पर आप कहते‌ - अब लौट जाओ मैं चली जाऊंगी, बस चार कदम और चलना है... लेकिन ज़िद थी घर तक छोड़कर आना है। अंत में जब आपको छोड़ने की बारी आती थी तो चेहरा सारा सच बयां कर देता था। मन कहता - काश ये शाम कुछ देर ठहर जाए... मैं थोड़ा और वक़्त अपनी राजुला के साथ बिता सकूं। लेकिन कई मामलों में शाम भी निष्ठुर हो जाती है। वह मेरी क्या, किसी की भी नहीं सुनती। ऐसे मेें थोड़ी-सी ज़िद बहुत काम आती थी और अंत में बिछुड़न...

सच‌ कहूं तो तब से लेकर आज तक मैं किसी से कभी कोई ज़िद नहीं कर पाया, क्योंकि ये आप थे जो कहने से पहले मेरी हर बात समझ जाते। मेरे लिए आप एक‌ इंसान थे- 

जो हर संभव मेरे साथ रहता है
मेरी हर नादान चाह पूरी करता है
जो मुझमें ही रहता, मेरा ही गीत गाता है
मेरी वेदनाओं की संवेदना, मेरे रूह का आफ़ताब... 
मन करता है घंटों सामने बैठा रहूं और आपको सुनता रहूं। 

याद है... एक बार जब हम बस से सफ़र कर रहे थे तो मेरे शहर छोड़ने की बात‌‌ सुनकर आपकी आंखें‌ डबडबा गई थीं और गला रुध गया था।‌ कुछ कहना चाहते थे आप, पर केवल मेरा नाम ही ले पाए। लंबी सांस लेकर आपने ख़ुद को सामान्य दिखाने की कोशिश की। मैं आपके मन में चल रही ऊहापोह को‌ समझ तो गया था पर अफसोस...! उसे जाहिर नहीं कर पाया। 

मुझे ना आपका लड़ना-झगड़ना यहां तक कि कई बातों को लेकर ताना देना भी पसंद है। ऐसी कोई बात नहीं जो इस चाह को ज़रा-सा भी कम कर दे। हालांकि अब आप साथ नहीं हो.. लेकिन लगता है दूर रहकर भी पास हो।
एक बात तो तय है आपके दूर हो जाने के बाद अब मेरे ख़्वाब... ख़्वाब ही रहेंगे। सुबह से लेकर शाम तक और शाम से लेकर सुबह तक आपसे बातें करने का ख़्वाब ।
जीभर के देखने, तुम्हारे बालों से खेलने का ख़्वाब ।
हाथों में हाथ लेकर उस‌ पल्ले वाले छोर तक जाने का ख़्वाब। शायद यही हमारा प्रारब्ध था।

इस सब के बावजूद आज भी मेरे लिए आप वही हो-

जो मुझे मुझसे भी ज्यादा जानता है।
मेरे हर सवाल का जवाब, मेरे पार्थिव का प्राण
तुम बिन मैं कुछ भी नहीं केवल खूंट-ठूंठ के। 

आप थे तो बागों में बहार थी, सावन की महकार के साथ बसंत की फुहार भी... पर अब ये दौर पतझड़ का है और यह जीवन का एक अर्ध सत्य...। 

सदा तुम्हारा




                      ©Bhaskar Sharma 

                                 ©म्यार फस्क 


Friday, 9 November 2018

उत्तराखंड से सीधी बात


स्थापना दिवस की बधाई उत्तराखण्ड.
सुनो तो सही, बीते सालों में जो हुआ सो हुआ. कई बार भूत को भूल जाना श्रेयस्कर होता है. आप भी कोशिश करो... भूल जाओगे. मुझे पता है आप दांत भींच रहे हैं, मुठ्ठी तान रहे हैं पर सच कहूं तो हमारे माननीय अब सचेत हो गए हैं। अब हर गांव में सीसी मार्ग से लेकर पक्की वाली सड़क बना दी गई है बल, बिल्कुल पक्की वाली, जिसका डामर सदी-सदी तक पीछा नहीं छोड़ेगा, इतनी पक्की. स्कूलों में बच्चों की तो ठाट करवा दी है. एक बखत का दलिया और दाल-भात उन्हें तंदुरुस्त, ह्रस्त-पुष्ट बना रहा है. अध्यापकों की तो फौज खड़ी कर दी है. मजाल है कोई बच्चा पढ़ने-लिखने से छूट जाए. सुनने में तो आया है घर से खींच कर बच्चों को स्कूल ले जा रहे हैं बल... गज़ब का बदलाव आ गया है हो.
जल- ज़मीन बेच खाने वालों की तो खैर नहीं। ऐसी धाराएं लगा दी हैं बल 'माफिया नाम' इतिहास की बात हो गई है और नौजवानों को तो १२ पास होते ही जबरदस्त रोजगार का ऑफर मिल रहा है. इतनी मोटी रकम बतौर वेतन मिल रही है बल कट्टे कम पड़ जा रहे हैं.
भ्रष्टाचार..! भ्रष्टाचार तो हो ही नहीं दे रहा है बल, ऊपर से नीचे तक सब सुधर गए हैं. घोषणा पत्रों का अक्षरश: पालन हो रहा है और मरीजों का तो 108 में इलाज हो रहा है. कहीं जाने की जरूरत ही नहीं ठैरी. ठाट हो गए हैं सबके.
पलायन...! ऐसी व्यवस्था सरकार ने कर दी है कि पलायन वालों का तो फंग्यो पकड़ के उनके घर पहुंचा दिया जा रहा है. खेतों में गुनी, बांदर, सौल, सुअर आ ही नहीं दे रहे बल. ऐसी बेहिसाब पैदावार हो रही है कि खाने वाले कम पड़ जा रहे हैं. जंगल ऐसे भभक गए हैं बल उनमें घुसना मलतब जान से हाथ धोने जैसा हो जा रहा है. अरे क्या बताऊं विस्फोटक बदलाव आ गया है हो.
कुल मिलाकर राम राज आ गया है बल और क्या चाहिये आपको. बाकी द्य-द्याप्त देख लेंगे. आप बेकार में रुणि रहे हैं. इसीलिए हे..! उत्तराखण्ड अब खुशियां मनाओ, फगारि बुलाओ मंगल गीत गाओ.. एक बार फिर से जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएं.
आपका अपना 

Wednesday, 10 January 2018

गुरू... हमें ना सताइए

प्रतीकात्मक तस्वीर
मारिए, मारिए कस के मारिए
हर स्टाइल से मारिए
ऊपर-नीचे, दाएं-बायें
धुआं उड़ाइये, छल्ले बनाइये
सिगरेट का बंडल मिनटों में फूंक डालिए
पर, गुरू हमें ना सताइए

पीजिए-पीजिए, रजनी स्टाइल में पीजिए
अरे भई, बीड़ी फूंकिये, सिगरेट फूंकिये
हो सके तो गांजा भर के फूंकिये
अपने केबिन को शौक से गैस चेम्बर बनाइये
फेफड़ों में खूब टार जमा करिये
पर, गुरू हमें ना सताइए

ये जो आप सिगरेट सुलगाने के साथ
केबिन का एडजस्ट फैन ऑन कर देते हैं ना
बाय गॉड, तंत्रिका तंत्र बिगड़ जाता है
नाक में धुंआ घुसने के साथ ही
ब्रह्मांड हिल जाता है
करिए, सिगरेट के साथ हीं-हीं, ठा-ठा खूब करिए
पर, गुरू हमें ना सताइए

आप मौज से पीजिये और
दीजिये, दूसरों को दीजिए
सिर दर्द, सीना दर्द दीजिये
चाहो तो केजरी खांसी लगवा दीजिये
हो सके तो  लोगों की सांसें बंद करवा दीजिए
जो हों आपके इस शौक से खुश
सबको बेचैन करिये, परेशान करिये
पर, गुरू हमें ना सताइए

वाह गुरू... बहुत खूब
आप दफ्तर में पीजिए और धुंआ हमारे मुंह में छोड़िए
अट्टहास कर फूंकिये और शर्म हमसे कराइये
मानो तो एक दरख़्वास्त है
सिगरेट छोड़िए, जियो और जीने दो की राह अपनाइए
नहीं मानते, भाड़ में जाइए
पर, गुरू हमें ना सताइए 

Wednesday, 5 July 2017

पहली किश्त, बचपन की

पूष की एक शाम घाटी में एक छोटे-से टीले पर बैठे-बैठे मैं क्षितिज की ओर टकटकी लगाए देख रहा था। दूर पहाड़ पर चीड़ के पेड़ निःशब्द खड़े थे, सूर्य भी अपनी किरणें समेटने को था। तभी चिड़ियों का झुंड़ उड़ता हुआ आया और मेरी आंखों के सामने से ओझल हो गया। हवा की शीतलता गहराने लगी थी। हालांकि मैं दो-तीन ऊनी कपड़े पहने था फिर भी हवा उन्हें बेधकर बदन को ठिठुरा रही थी। गधेरे के पानी को ढलते सूरज की किरणें चमका रही थी, लग रहा था मानो किसी ने मुंह पर दर्पण लगा दिया हो। हवा तेज हो चली थी। गधेर के पास खड़े उतीश और मेव के पेड़ों की डालियां हिलने से बहता पानी भी झिलमिला-सा रहा था, एकाएक चमकता और ढक जाता। पीठ पीछे चीड़ के पेड़ों की पत्तियों पर हवा की सरसराहट और तेज हो गई। नीचे आम के पेड़ों के झुरमटों के बीच पक्षियों की चहचहाहट बता रही थी कि अब घर लौट चलो शाम अपने अंतिम पड़ाव पर है। बांयी ओर की धार में अचानक धूल का बवंडर आसमान की ओर उड़ता दिखाई दिया। धूल कुछ छटीं तो देखा गायों का झुंड़ दौड़ता हुआ नीचे की ओर आ रहा है, जो कुछ ही पलों में काफल के पेड़ों की ओट में गुम-सा हो गया। घाम अब चढ़ाई चढ़ते हुए दूर पहुंच चुका था। इतनी देर में आंखों के सामने से कुन्स्यावों का जोड़ा सरपट पास के झूड़ों में ओझल हो गया।उधर, पल्ले छोर पर पहाड़ों के ऊपर घने बादल अपना डेरा जमाए थे। तभी तेज हवा का झौंका सामने वाले पहाड़ से जा टकराया और इसी के साथ सूरज भी अस्त हो गया।

ज्यों ही सूर्य की किरणें शुभरात्रि कह गईं ठंड का अहसास और बढ़ा गईं। कुछ देर बाद नाक से पानी भी आने लगा। पोछने को हाथ बढ़ाया तो मालूम पड़ा कि नाक की डंठल भी सुन्न-सी हो गई है। सुना है कल रात नैनीताल की ओर बर्फ पड़ी थी। दो-चार दिनों में यहां भी पड़ने की उम्मीद है। अगास की ओर देखा तो चंद्रमा भी अपने साथ घेर लिए हुए आगे बढ़ रहा था। उधर बादल अपनी चकाचौंध दिखाते हुए अग्रसर हो रहे थे। ठीक ही किया जो बीती शाम लकड़ियां बंटोर ली, नहीं तो खाने पकाने के लिए मशक्कत करनी पड़ती। भीगी लकड़ियों से खाना बनाते ईजा की आंखें धुएं से नम हो जाती ना। खैर, अब अलाव धुंआ नहीं करेंगे।

अंधकार अपनी बिसात बिछा रहा था। मैं भी घर की ओर चल दिया। रूंड़ में आग जलाकर रात के भोजन की तैयारी करने लगा। इस बीच कमरा भी अच्छी तरह गर्म हो गया था।आसमानी बिजली आंगन के पाथरों पर पड़े पाले को चमका रही थी। सामने के जंगल में एक मैना बहुत देर से क्रंदन कर रही थी। लगता है उसका घरौंदा किसी बानर ने नष्ट कर दिया है। हवा थमने का नाम नहीं ले रही थी, जिसके कारण संतरे के पेड़ों पर बैठे पंछी लगातार चहचहा रहे थे। रात का पहला प्रहर बीतने को था। अभी तक ईजा और बाज्यू काम से नहीं लौटे थे। द्वार उघाड़कर देखा तो बाहर घुप्प अंधेरा था। टॉर्च लेकर उन्हें खोजने निकला तो सर्द हवाओं ने फिर पूरा बदन कंपा दिया। सारी गर्माहट छू हो गई। अभी सौ एक मीटर ही चला था, देखा सामने से कोई खतरनाक जीव मेरी ओर बढ़े चले आ रहा है। मैं थोड़ा सहम गया। कमबख्त टॉर्च की रोशनी भी वहां तक नहीं पहुंच रही थी। अचानक शेरू पूंछ हिलाते हुए सामने आ गया और उछल कूद शुरू कर दी। पुचकारने पर शांत हो गया। ईजा और बाज्यू भी अब पास ही पहुंच गए थे। ईजा के सिर पर रखा घास का गठ्ठर स्याह रात में किसी जंगली जानवर से कम नहीं लग रहा था। पिछले ही महीने तो बाग और शेरू की भिड़त हुई थी उस पल्ले वाले धार के खेत में, भाग अच्छे थे बच गया। खैर, अब जान पर जान आ गई थी। बाज्यू साथ हैं तो डरने की क्या बात है। फिर सब साथ हो लिए और जानवरों को चारा देन के बाद हम घर आ गए और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। ईजा ने पिनालू की सब्जी और मडुवे की रोटी पात दी साथ में दही का छसिया, वाह क्या लज़ीज खाना। ईजा के हाथों बना....

अब, वह सब बहुत याद आता है। मैं आज वहां नहीं हूं पर मन हर रोज उन पहाड़ों की सैर जरूर करता है। इस शहर में आए दस साल होने को हैं। यहां न दिन निकले का पता पड़ता है, न ही शाम ढलने का। दिनभर सड़कों पर गाड़ियों की भूंभाट और कान फोड़ू शोर-शराबा। जुलाई शुरू हो गया है। उमस भरी इन गर्मी के दिनों को काटना मेरे लिए अब भी बहुत दुष्कर है। चाहे घर के भीतर रहो या बाहर पसीने से लथपथ ही रहोगे। लेकिन अब कुछ आदत हो गई है यूं ही रहने की। कुछ परेशान भी होता हूं, पर मेरे पास अभी कोई दूसरा विकल्प नहीं है। तलाश जारी है... और इस उधेड़बुन में जब भी अकेला होता हूं तो बचपन आंखों में तैरने लगता है। जिसकी यह पहली किश्त थी और आज सार्वजनिक हो गई...।
   



फसकः भास्कर शर्मा



Tuesday, 29 November 2016

शरत की ‘खोवी’


शरद ऋतु अपने अंतिम पड़ाव पर है, तो जाहिर-सी बात है बागों में क्या, कहीं भी बहार देखने को नहीं मिलेगी। क्योंकि वर्षा काल में जमीन पर कई जीवाणु पनप आते हैं, जिन्हें खत्म करने के लिए सूर्य की किरणें ऊष्म और हवाओं का वेग बढ़ जाता है। बाकी जो बच जाता है धरती में समा जाता है। फिर भी एक जगह है जहां बहार है। वह है ‘कीचड़’। जहां कमल दल खिले हैं और भौंरे गुंजन कर रहे हैं, पर स्वच्छता अभियान के इस दौर में सफाई पंसद लोग खुद को भला क्यों कीचड़ से सना पसंद करेंगे?

पहाड़ों में भी मौसम खुश्क हो चला है। हर्यमान रहने वाले पौड़ सूनसान- विरान से हो गए हैं। बीती दिवाली गांव जाने का मौका मिला। ‘शरद’ का सबसे ज्यादा असर वहां नजर आया। दिनभर का तपा देने वाला घाम और रात में सर्द हवाओं की रजाई के कोनों से आवाजाही, मतलब अगली सुबह ‘नाकबंदी’, जिसे ठीक करने के लिए गर्म पानी और कुछ देर में ‘कडक़ चाय’ की सख्त दरकार। अगर यह व्यवस्थाएं हो जाएं तो ‘सोने में सुहागा’। 

इस मर्तबे घर चार माह बाद ही पहुंच गया था, अपने प्रोफेशन में ऐसे मौके कम ही मिलते हैं। पिछली बार गांव वालों से मिल नहीं पाया था। इस बार कसर पूरी की, लेकिन यहां भांग के पौधे ‘शरत’ को लगता है जाने नहीं देंगे। इस दिनों यहां भांग (चरस) के पत्तों की मंड़ाई का काम जोरों पर है। चरस के मायनों में यह बात अच्छी है कि मेरी उम्र के लोग अब गांव में नहीं हैं। अगर होते तो ज्यादातर नशे में चूर ही होते। रोजगार के लिए लोग शहरों में प्रवास कर गए हैं या पलायन कर गए हैं। अब क्या कीजिएगा सरकार छुट्टी पर चल रही है। पता नहीं कब लौटे की। नाकारा-सी हो गई है। अब सवाल उठता है कि क्या हम भी ‘नाकारा’ हो जाएं? यह बात हर किसी के सामने प्रश्न चिह्न है। आखिरकार लोग नशे के खेती क्यों करते हैं, यह जानते हुए यह ‘दम’, दम निकाल देती है। पहाड़ों में चरस को आम भाषा में दम, अत्तर और भोले की बूटी कहते हैं। 

पूछने पर एक व्यक्ति ने बताया कि गांव में लोगों के पास रोजगार नहीं है। सरकारी काम बहरहाल बंद हैं। प्रधान कहते हैं कि हमने प्रस्ताव भेजा है, देखो कब तक पास होता है। जो छोटा- मोटा काम आता है, कुछ तो लोग डकार जाते हैं और कुछ की सिद्धि कर दी जाती है। भुला, पहाड़ों में पानी तो ठहरता नहीं, बारिश का भी इन सालों कोई भरोसा नहीं। हुई तो ठीक, ना हुई तो रोटी का संकट। जिनकी आर्थिक स्थिति थोड़ी ठीक- सी है वह बिस्तर समेट कर गांव से निकल गए हैं, जो बचे हैं पेट तो उनका भी है। दो चार पैसे कमाएंगे नहीं तो इस कलयुग में खाएंगे क्या? सच बताऊं तो कुछ न सही, पर भोले की बूटी 100-50 तो दिला ही देती है। सीजनी है, पर कुछ राहत जरूर है, लेकिन बच्चों के नशे की लत पर वो चुप्पी साध लेते हैं। सरकार ने अत्तर के खिलाफ कड़े कानून तो बनाए हैं, पर यहां की स्थिति देखकर असर कुछ नजर नहीं आता।

यह अचरज वाली बात यह है कि मुझे गांव में कोई भी नशे में चूर नहीं आया। मतलब साफ है कि अत्तर गांव से बाहर जाती है। हालांकि वहां पीने वालों का कमी नहीं है। अब सबसे बड़ी बात, इस काम में महिलाओं की सहभागिता भी कम नजर नहीं आती। भांग के पौधों को मांड़ते हुए एक आमा कहती हैं कि हमारे यहां भागं की चटनी का कोई सानी नहीं है। अभी पूस (पौष) लगने वाला है। साग-सब्जियां जब नहीं होती तो मड़ुवे की रोटी के साथ भांग का नमक ही काम आता है और इसके औषधीय गुणों के क्या कहने इसके पत्तों का रस निचोड़ कर घाव में डाल दो तो मजाल है कि भरे ना।  

उधर, घाम भी धारों में पहुंच गया था। घर लौटते समय गांव की ही एक काकी ने पूछा  ‘म्यर राकेश कै ना दिख्याये काईं’? (क्या तुमने मेरे राकेश को नहीं देखा?) मेरी ना पर उन्होंने कहा ‘खोवी चा रे हुनैल’। (खोवी देख रहा होगा) पहले तो मेरी समझ नहीं आया कि आखिर ‘खोवी’ है क्या? पूछने पर हंसते हुए उन्होंने बताया कि ताश के पत्तों का खेल जहां होता है उसे ‘खोवी’ कहते हैं। 

दरअसल, 15 अक्टूबर तक पहाड़ों में सबके खेतों का काम निपट जाता है और अगले 1 माह तक लोग इधर-उधर ‘खोवियों’ में बैठकर या तो टाइम पास करते हैं या पिछले छह माह की कमाई गंवाते हैं। अगले दिन वापसी थी तो गाड़ी में किसी ने बताया कि पाटी के गिरीश ने खोवी में सब कुछ हाने के बाद जिंदगी से भी हार मान ली। जहर पीते हुए उसे एक पल भी नहीं सूझा कि उसके बाद उसकी पत्नी और दो बच्चों के भविष्य का क्या होगा?
इसीलिए बागों में बहार नहीं है और ‘शरद’ खुश्क।
सरकार हृष्ट-पुष्ट है, प्रशासन नाकारा और कामचोर।
नेताओं के मन में है खोट, दिखता उन्हें केवल वोट।
रोजी-रोटी के लिए लगी है लंबी कतार।
यहां भी है नाकाबंदी।
यदि नहीं है आपके पास ‘काले-सफेद’ का तजुर्बा 
तो सब बेकार।
है तो बस, 'बागों' में बहार...। 


फसक ः भास्कर शर्मा

Monday, 15 August 2016

बग्वाल मेला (अषाढ़ी कौथिक)

एक-दूसरे को पत्थर मार कर लहूलुहान करने की परम्परा 

देवीधुरा के  खोलीखांड़- दुबाचौड़ मैदान में बग्वाल के लिए एकत्रित होते द्योत।


उत्तराखंड के देवीधुरा में रक्षाबंधन के मौके पर होता है “पाषाण युद्ध” 


जहां एक ओर पूरा देश रक्षाबंधन की तैयारियों में लगा है, वहीं दूसरी ओर अपनी नैसर्गिक सौंदर्य की छटा बिखेरने वाला उत्तराखंड एक बार फिर पाषाण युद्ध (बग्वाल मेला) के लिए तैयार है। आस्था के केंद्र मां बाराही मंदिर देवीधूरा, में होने वाले इस ऐतिहासिक युद्ध के अब कुछ ही दिन शेष हैं। श्रावण मास की पूर्णिमा को होने वाली 'बग्वाल' के लिए रणबांकुरे अपने संबंधियों को आमंत्रण भेजने लगे हैं। ढोल-दमाऊं के ताल कसे जाने के साथ-साथ मशकबीन, रणसिंहाओं की धूल झाड़ी जा रही है और छंतोलों (छत्र, फर) की सजावट का काम जारी है। बाजार सजने शुरू हो गए हैं। बग्वाल मेले को सफल बनाने के लिए जिला प्रशासन ने भी कमर कस ली है। पूरे देवीधुरा कस्बे पर सीसीटीवी कैमरों से लैस कर दिया गया है और चप्पा-चप्पा पुलिस की निगरानी में है। आपसी सद्भाव की इस जीती-जागती मिशाल को देखने विश्वभर से तमाम श्रद्धालु यहां पुहंचने शुरू हो गए हैं। नए नजर इस पाषाण युद्ध के इतिहास पर।


बग्वाल मेला (अषाढ़ी कौतिक)

यहां पत्थरों से खेली जाती है  “बग्वाल”
चंपावत जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित देवीधुरा, मां बाराही देवी मंदिर के प्रांगण (खोलीखांड़-दुबाचौड़) में प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा को मेला लगता है, जिसे स्थानीय भाषा में अषाढ़ी कौतिक भी कहते हैं। इसका सर्वाधिक आकर्षण हैः बग्वाल मेला। जिसमें चार खामों (दल) के लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। माना जाता है कि पत्थरों से चोट लगने के बाद बहा खून मां बाराही (पार्वती) को समर्पित हो गया। हालांकि इस मेले की पौराणिकता‌ को लेकर लोगों की राय एक नहीं हैं, फिर भी समझा जाता है कि नरबलि परम्परा का यह अधुनातन रूप है। ऐसी मान्यता है कि पृथ्वी में जब राक्षसों का आंतक बढ़ा तो वह बाराही के विग्रह (मूर्ति) को उठाकर रसातल में ले गए। हाहाकार मचने पर भगवान विष्णु ने बराह अवतार में उस दैत्य का उद्धार किया और मूर्ति भू लोक में ले आए। फिर जिस स्थान पर उसकी स्थापना की गई, वह बाराही सिद्धपीठ के नाम से विख्यात हुआ। मंदिर के महत्वपूर्ण स्थलों में खोलीखांड़-दुबाचौड़, मचवाल, गुफा के भीतर शक्ति पीठ (गबौरी), शंखचक्र घंटाधर गुफा और भीमशिला प्रमुख हैं।

कैसे हुई बग्वाल की शुरुआत

स्थानीय निवासी जगदीश जोशी बताते हैं- ऐसी मान्यताएं हैं कि हजारों वर्षों पहले जब राक्षसों का आतंक बढ़ गया था, तो देवी के गणों ने राक्षसों से मुक्ति के बदले प्रजा से नर बलि की मांग की, जिसके बाद स्थानीय लमगड़िया, चम्याल, गहड़वाल और वाल्किया (खाम) कुलों के लोग क्रमशः अपने लोगों की बलि देते थे। उन्होंने बताया कि एक बार बलि के लिए चम्याल कुल के एक ऐसे परिवार की बारी आई जिसका केवल एक ही पुत्र था। परिवार की मुखिया (एक वृद्धा) ने उसे बचाने के लिए तपस्या शुरू कर दी, जिससे प्रसन्न होकर मां बाराही ने कहा कि यदि चारों कुलों के लोग मंदिर प्रांगण में एकत्र होकर युद्ध कौशल दिखाएं, इस दौरान जब एक युवक के रक्त के बराबर खून बह जाए तो युद्ध बंद कर दिया जाए। इससे गण प्रसन्न हो जाएंगे और नरबलि से छुटकारा मिल जाएगा। उस काल में स्थानीय लोग अश्म युद्ध यानी पत्थर मार कर किए जाने वाले युद्ध में प्रवीण थे। तब से पत्थर मार युद्ध यानी बग्वाल शुरू हुई और खोलीखांड- दूबाचौड़ का मैदान विश्व प्रसिद्ध हो गया। हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा को यहां 'अश्म वृष्टि' होती है।

अश्म था योद्धाओं का हथियार

इतिहास के जानकारों की मानें तो महाभारत काल में पर्वतीय क्षेत्रों में निवास कर रही एक जाति ऐसी थी जो अश्म युद्ध (पत्थर मार युद्ध) में प्रवीण थी और इन योद्धाओं ने पाण्डवों की ओर से महाभारत के युद्ध में भाग लिया था। जो इस बात को पुष्ट करती है कि यह प्रथा पुरातन काल से चली आ रही है।

पुजारी के इशारे पर शुरू होती है “बग्वाल”

युद्ध से पहले चारों खामों के लोग अपनी टोलियों से साथ पूरे मंदिर परिसर की परिक्रमा करते हैं। ढोल-नगाड़ों का नाद, शंख-घंटों की टंकार और मां की जयकार के साथ द्योत उछलते- कूदते पूरे जोशो-खरोश के साथ खोलीखाड़-दुबाचौड़ मैदान में एक-एक कर प्रवेश करते हैं। पीली पगड़ी पहने द्योत (बग्वाल खेलने वाले), हाथों में छंतोले (छत्र) लिए जब प्रांगण में आकर प्रतिद्वंद्वियों की टोह लेना शुरू करते हैं तो ऐसा लगता है कि मानो योद्धाओं की फौज व्यूह रचना कर रही हो। वालिक्या और लगमड़िया खाम पश्चिमी छोर से तो चम्याल और गहड़वाल पूर्वी छोर से रणभूमि में गर्जन करते नजर आते हैं। आसमां जयकारों और रणबांकुरों की ललकार से गुंजायमान हो जाता है। मंदिर के पुजारी से संकेत मिलने के बाद गहड़वाल खाम के द्योत सबसे पहले पत्थर मारते हैं और फिर शुरू हो जाता है द्वंद्व।
 खोलीखांड़-दुबाचौड़ मैदान में बग्वाल के दौरान छंतोलों के नीचे आकर
पत्थरों से बचने का प्रयास करते द्योत।

कुछ समय के लिए खोलिखाड़-दुबाचौड़ मैदान के ऊपर केवल पत्थरों की आवाजाही दिखती है। सरसराते पत्थर जब द्योतों के ऊपर गिरते हैं तो खून की बहती धार, उनका उत्साह और बढ़ा देती है। लाखों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालु दशर्क दीर्घा से इस “बग्वाल” के गवाह बनते हैं, जो जयकारों से द्योतों का उत्साह बढ़ाते नजर आते हैं।
जब पुजारी को आभास हो जाता है कि एक व्यक्ति के रक्त के बराबर लहू बह चुका है तो वह बिना किसी सुरक्षा कवच के लड़ाई के मैदान में पहुंच, शंख बजाकर युद्ध समाप्ति की घोषणा करते हैं। हालांकि खामों में लोग एक-दूसरे के मित्र या सगे-संबंधी ही होते हैं परंतु रणभूमि में कुछ देर लिए वह सभी नाते-रिश्ते भूल कर परम्परा का निर्वाह करते हैं। कहा जाता है कि 1945 से पहले युद्ध के दौरान पत्थरों से बचने के लिए फरों (छंतोला,छत्र) का प्रयोग नहीं किया जाता था।

जब उठता है सिंहासन डोला

किंवदंतियां हैं कि मां बाराही की प्रतिमा का तेज इतना है कोई भी उन्हें खुली आंखों से देख नहीं आज तक नहीं देख पाया। जो भी ऐसा दुस्साहस करता है, वह अंधा हो जाता है। स्थानीय निवासी घनश्याम शर्मा ने बताया कि श्रावणी पूर्णिमा के दूसरे दिन बक्से में रखे देवी विग्रह (प्रतिमा) को मंदिर के मुख्य पुजारी भी आंखों में पट्टी बांधकर नहलाते हैं और उसके बाद सिंहासन (डोले) पर उन्हें सजाकर शोभा यात्रा निकाली जाती है। जब लोग माता के डोले को कंधों में उठाकर उनके मायके, मचवाल की ओर चलना शुरू करते हैं तो पीछे से श्रृद्धालुओं का कारवां भी साथ चलता है। कहा जाता है कि जब माता का डोला वापस खोलीखांड़-दूबाचौड़ पहुंचता है तो बारिश होती है। मान्यता है कि यह बारिश मायका छोड़ने के दुख में देवी की आंखों से निकले आंसू हैं।

निर्मम जानवरों की बलि

मान्यता है कि देवी को अठ्वार (अष्ठ बलि) देने से वह खुश होती हैं। लोग मन्नत पूरी होने के बाद अठ्वार में सात बकरों और एक भैंसे की बलि देते हैं। बकरों के मांस को तो लोग खा लेते हैं लेकिन भैंसे को यूं ही छोड़ देते हैं। कुछ साल पहले उच्च न्यायालय ने आस्था के नाम पर जानवरों की निर्मम हत्या पर संज्ञान लेते हुए भैंसे की बलि पर रोक लगा दी।

बदलने लगा है बग्वाल का प्रतिरूप

वर्षों से चली रही एक परंपरा (पाषाण युद्ध) के दौरान घायलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रशासन ने युद्ध के तौर-तरीकों में बदलाव कर दिए हैं। बग्वाल मेले के इतिहास में पहली बार साल 2013 में चारों खामों (दल) के रणबांकुरों ने पत्थरों की बजाय फलों (गोल नाशपाती) से बग्वाल खेली। हालांकि कुछ ही देर में द्योतों ने एक–दूसरे पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए थे। आंकड़े बताते हैं कि उस साल प्रशासन की सख्ताई के बावजूद लगभग 80 लोग घायल हुए थे। बीते वर्ष भी पत्थरों की मार से कई लोग घायल हो गए थे। स्थानीय निवासी जगदीश बताते हैं कि बग्वाल खेलने वालों को पिछले तीन दिनों से खुद को पाक रखना पड़ता है। उन्हें सभी तरीके के गरिष्ठ भोजनों को तिलांजलि देनी पड़ती है, जो लोग बिना त्याग किए बग्वाल खेलते हैं अक्सर उन्हें ही गंभीर चोट पहुंचती है।

कैसे पहुंचे “अषाढ़ी कौतिक”

महाभारत काल में पांडवों से जुड़ी अनेक घटना का गवाह, माँ बाराही धाम सुमद्रतल से लगभग 6500 फिट की ऊँचाई पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए काठगोदाम तक ट्रेन या बस के जरिए और उसके बाद 111 किलो मीटर का रास्ता स्थानीय गाड़ियों या टैक्सी/कैब से नापा जा सकता है।
खाेलीखांड़ दुबाचौड़ का मैदान।  फोटो ः चंद्र शेखर  द्विवेदी

फसक ः भास्कर शर्मा